शब्दार्थ-
उद्वेलित- भाव विह्वल, भावना में गलाकर
अश्रु-राशियाँ- आँसुओं की झड़ी
हृदय-चिताएँ- चिता के समान प्रतीत होने वाला दिल
धधकाकर- सुलगाकर महा-
बड़ा
महामारी- बहुत बड़े स्तर पर फैलने वाली बीमारी
प्रचंड- उग्र, तीव्र
क्षीण
कंठ- मरियल आवाज, दबी हुई आवाज
मृतवत्सा- जिसका बच्चा मर गया हो
करूण रुदन- करुणा पैदा करने वाला
दुर्दांत-भयंकर
नितांत-बिलकुल,एकदम
निज-अपना
कृश रव- कमज़ोर आवाज़
हाहाकार- चीत्कार,चिल्लाना
अपार- अत्यधिक, जिसे पार करना कठिन हो
आशय-
कवि महामारी की भयंकरता का चित्रण करता
हुआ कहता है- चारों ओर एक महाभयंकर महामारी फैल गई थी | उसके कारण पीड़ित लोगों की
आँख में आँसुओं की झड़ियाँ उमड़ आई थी | उनके हृदय चिताओं की भाँति धधक उठे थे | सब लोग दुख के मारे बेचैन थे
| अपने बच्चों को मृत देखकर माताओं के कंठ से अत्यंत दुर्बल स्वर में करुण रुदन
निकल रहा था | वातावरण बहुत हृदयविदारक था | सब ओर अत्यधिक व्याकुल कर देने वाला
हाहाकार मचा हुआ था | माताएँ दुर्बल स्वर में रुदन मचा रही थी|
बहुत
रोकता था सुखिया को, ‘न जा खेलने को बाहर’,
नहीं खेलना रुकता उसका नहीं ठहरती वह पल भर |
मेरा
हृदय
काँप उठता था, बाहर गई निहार उसे;
यही
मानता
था कि बचा लूँ किसी भाँति इस बार उसे
कठिन
शब्दार्थ
–
पल
भर- थोड़ी देर के लिए
हृदय काँपना – भयभीत होना
निहार – देखकर
आशय-
सुखिया का पिता कहता है- मैं अपनी बेटी सुखिया
को बाहर जाकर खेलने से बहुत मना करता था |
मैं बार-बार कहता था-
’बेटी,
बाहर खेलने मत जा
|’
परंतु वह बहुत चंचल और हठीली थी| उसका खेलना रुकता नहीं था | वह पल भर के लिए भी
घर में
नहीं
रुकती थी | मैं उसकी इस चंचलता को देखकर भयभीत हो उठता था | मेरा दिल काँप उठता था
| मैं मन में
हमेशा यही कामना करता था कि किसी
तरह अपनी बेटी सुखिया को महामारी की चपेट में आने से बचा लूँ |
भीतर
जो डर रहा छिपाए, हाय ! वही बाहर
आया|
एक दिवस सुखिया के तनु को ताप तप्त
मैंने पाया|
ज्वर में विह्वल हो बोली वह, क्या जानूँ
किस डर से डर,
मुझको
देवी
के प्रसाद का एक फूल ही दो लाकर |
शब्दार्थ
–
हाय!- अफसोस
दिवस-
दिन
तनु-
शरीर
ताप
तप्त- बुखार के कारण गर्म
ज्वर- बुखार
विह्वल- दुखी
आशय-
सुखिया
का पिता इस काव्यांश का वक्ता है| वह कहता है- अफसोस ! मेरे मन में यही डर था कि
कहीं मेरी बेटी सुखिया इस महामारी की शिकार न हो जाय | मैं इसी से डर रहा
था | वही डर आखिरकार सच हो गया | एक दिन मैंने देखा कि सुखिया का शरीर बीमारी के कारण जल रहा है | वह बुखार से पीड़ित
होकर और न जाने किस अनजाने भय से भयभीत होकर मुझसे कहने लगी- पिताजी ! मुझे
माँ भगवती के प्रसाद का एक फूल लाकर दो |
क्रमशः
कंठ
क्षीण हो आया, शिथिल हुए अवयव
सारे,
बैठा
था
नव-नव उपाय की चिंता में मैं मनमारे
|जान
सका
न प्रभात सजग से हुई अलस
कब दोपहरी,
स्वर्ण-घनों में कब रवि डूबा, कब आई
संध्या गहरी |
शब्दार्थ
-
क्रमशः
- धीरे-धीरे कंठ- गला
क्षीण
- कमजोर शिथिल- ढीले
अवयव-
अंग नव-नव – नया-नया
उपाय-
ढंग मनमारे- मन को दबाए हुए
प्रभात
सजग-
हलचल से भरी सुबह अलस- ढीली
स्वर्ण
घन-
सुनहरी बादल रवि- सूरज
संध्या-
साँझ
आशय-
सुखिया का पिता महामारी से ग्रस्त सुखिया की
बीमारी बढ़ने का वर्णन करता हुआ कहता है
-
धीरे-धीरे महामारी का प्रभाव बढ़ने लगा | सुखिया का गला घुटने लगा| आवाज मंद होने
लगी | शरीर के सारे अंग ढीले पड़ने लगे | मैं चिंता में डूबा हुआ निराश मन से उसे
ठीक करने के नए-नए उपाय सोचने लगा | इस चिंता में मैं इतना डूब गया कि मुझे पता ही नहीं चल सका कि कब प्रातःकाल की हलचल समाप्त
हुई और आलस्य-भरी दोपहर आ गई| कब सूरज सुनहरी बादलों में डूब गया और कब गहरी साँझ
हो गई |
सभी
ओर दिखलाई दी बस, अंधकार की ही
छाया,
छोटी-सी बच्ची को ग्रसने कितना बड़ा तिमिर
आया !
ऊपर
विस्तृत
महाकाश में जलते-से अंगारों
से,
झुलसी-सी जाती थी आँखें जगमग जगते तारों
से |
शब्दार्थ-
अंधकार-
अँधेरा छाया-
प्रभाव
ग्रसना-
निगलना तिमिर-
अँधेरा
विस्तृत-
चौड़ा महाकाश-
खुला आकाश
झुलसी-सी
– जली-सी जगमग-
चमकते
आशय-
सुखिया
का पिता सुखिया की बीमारी के कारण हुई निराशा का वर्णन करता हुआ कहता है-
सुखिया की बीमारी के कारण मेरे मन में ऐसी घोर निराशा छा गई कि मुझे चारों अँधेरा की ही छाया घिरी दिखाई देने लगी| मुझे
लगा कि मेरी नन्ही-सी बेटी को निगलने के लिए इतना बड़ा अँधेरा चला आ रहा है | जिस
प्रकार खुले आकाश में जलते हुए अंगारों के सामने तारे जगमगाते रहते हैं, उसी भाँति
सुखिया की आँखें ज्वर के कारण जली जाती थीं
|
वह बेहद बीमार थी
|
ऊँचे
शैल-शिखर
के ऊपर मंदिर था विस्तीर्ण
विशाल;
स्वर्ण
कलश
सरसिज विहसित थे पाकर समुदित रवि-कर-जाल |
दीप
धूप
से आमोदित था | मंदिर का आँगन
सारा;
गूँज रही थी भीतर-बाहर मुखरित उत्सव
की
धारा|
शब्दार्थ-
शैल-शिखर-
पहाड़ की चोटी विस्तीर्ण- फैला हुआ
स्वर्ण-कलश
सरसीज- कमल के समान सुंदर सोने के कलश
विहसित-
हँसते हुए, खिले हुए
समुदित-
अच्छी प्रकार खिला हुआ
रवि-कर-जाल
– सूर्य
की
किरणों का समूह
आमोदित-
आनंद से भरा मुखरित- प्रकट
आशय-
ऊँचे
पर्वत की चोटी के ऊपर एक विस्तृत और विशाल
मंदिर खड़ा था | उसका कलश स्वर्ण से बना हुआ था | उस पर सूरज की किरणें सुशोभित हो
रही थीं
|
किरणों से जगमगाता हुआ कलश ऐसा खिला-खिला प्रतीत होता था जैसे सूरज की रश्मियों को
पाकर कमल का फूल खिल उठा हो | मंदिर का सारा आँगन दीपों की रोशनी और धूप की सुगंध
से महक रहा था | मंदिर के अंदर और बाहर - सब ओर उत्सव जैसा उल्लासमय वातावरण था |
भक्त-वृंद
मृदु-मधुर कंठ से गाते थे सभक्ति
मुद-मय,-
‘पतित-तारिणी पाप-हारिणी, माता, तेरी
जय-जय-जय !’
‘पतित-तारिणी, तेरी जय-जय’- मेरे मुख से
भी निकला,
बिना
बढ़े
ही मैं आगे को जाने किस बल से ढिकला !
शब्दार्थ-
वृंद-
समूह
मुद
मय – प्रसन्नता सहित
पतित
तारिणी
– पतितों का उद्धार करने वाली
ढिकला
–
ठेला गया
आशय-
मंदिर
में भक्तों की टोली बड़ी मधुर और कोमल आवाज में आनंद और भक्ति से भरा हुआ यह जयगान
गा रही थी- ‘ हे पतितों का उद्धार करने वाली देवी ! हे पापों के नष्ट करने वाली
देवी ! हम तेरी जय-जयकार करते हैं|’
सुखिया
के पिता के मुँह से भी माता का जयगान निकल पड़ा | उसने दोहराया- ‘ हे पतितों का
उद्धार करने वाली देवी, तुम्हारी जय हो |’ यह कहने के साथ ही न जाने उसमें कौन-सी
शक्ति आ गई, जिसने उसे ठेलकर पुजारी के सामने खड़ा कर दिया | वह अनायास ही पूजा
स्थल के सामने पहुँच गया|
मेरे दीप-फूल लेकर वे
अंबा को अर्पित करके
दिया पुजारी ने प्रसाद जब
आगे को अंजलि भरके,
भूल गया उसको लेना झट,
परम लाभ-सा पाकर मैं।
सोचा, - बेटी को माँ के ये
पुनि-पुष्प दूँ जाकर मैं।
शब्दार्थ-
अंबा-
माँ, देवी अर्पित-
भेंट चढ़ाना
अंजलि-
दोनों हाथों का संपुट
परम
लाभ-
परमात्मा की कृपा, बहुत बडा लाभ
पुण्य-
पवित्र पुष्प-
फूल
आशय-
देवी माँ के प्रसाद का फूल लेने के लिए सुखिया का पिता मंदिर मेन पहुँचा | उस सामी का वर्णन करता हुआ पिता कहता है- मैंने दीप और फूल माँ को भेट चढ़ाएँ | पूजा के फूल लेकर मैं प्रसन्न हो उठा | तभी पुजारी ने दोनों हाथों से मुझे माँ की पूजा का प्रसाद दिया | परंतु मैं फूल के पाने की प्रसन्नता में उस उस प्रसाद को लेना भूल गया | मुझे तो वह फूल ही ईश्वर की अनुकंपा जैसा लाभकारी लग रहा था | अतः मैंने यही सोच कि जल्दी से घर जाकर अपनी बीमार बेटी को माँ की पूजा के ये फूल दूँ ताकि वह स्वस्थ हो जाए |
सिंह
पौर तक भी आँगन से नहीं पहुँचने मैं पाया,
सहसा
यह
सुन पड़ा कि-”कैसे यह अछूत भीतर आया
?
पकड़ो,
देखो भाग न जावे, बना धूर्त यह है कैसा;
साफ़-स्वच्छ
परिधान किए है, भले मानुषों के जैसा !
पापी
ने
मंदिर में घुसकर किया अनर्थ बड़ा भारी;
कलुषित कर दी है मंदिर की चिरकालिक शुचिता सारी
|”
शब्दार्थ-
सिंह पौर – मंदिर का मुख्य द्वार सहसा- अचानक
धूर्त- छली परिधान- वस्त्र
अनर्थ- पाप कलुषित- अपवित्र, काली
चिरकालिक - लंबे समय से बनाई हुई
शुचिता- पवित्रता
आशय-
सुखिया
का पिता देवी के मंदिर में फूल के लेने
लिए जाता है तो पहचान लिया जाता है | तब वह अपनी आपबीती सुनाते हुए कहता है- मैं पुजा
करके मंदिर के मुख्य द्वार तक भी पहुँचा नहीं था कि अचानक मुझे यह स्वर सुनाई पड़ा-
‘यह अछूत मंदिर के
अंदर कैसे आया ? इसे पकड़ो | सावधान रहो | कहीं यह दुष्ट भाग न जाए | यह कैसा ठग है ! ऊपर से साफ-सुथरे कपड़े पहन कर
भले आदमियों जैसा रूप बनाए हुए है | परंतु है महापापी और नीच | इस पापी ने मंदिर में घुसकर बहुत बडा पाप कर दिया है | इसने इतने लंबे समय से बनाई गई मंदिर कि पवित्रता
को नष्ट कर दिया है | इसके प्रवेश से
मंदिर अपवित्र हो गया है|’
ऐं ,
क्या मेरा कलुष बड़ा है देवी की गरिमा से
भी ;
किसी
बात
में हूँ मैं आगे माता की महिमा के भी
?
माँ के भक्त हुए तुम कैसे, करके यह
विचार खोटा?
माँ
के
सम्मुख ही माँ का तुम गौरव करते हो छोटा !
शब्दार्थ-
कलुष-
पाप
गरिमा-
महानता
महिमा- महत्त्व
खोटा-
गलत
गौरव-
महानता, ऊँचाई
आशय
सुखिया के पिता मंदिर में पूजा का फूल लेने गए तो
भक्तों ने उन्हें अछूत कहकर पकड़ लिया | तब सुखिया के पिता उन
भक्तों से बोले- यह तुम क्या कहते हो ! मेरे मंदिर में आने से देवी का मंदिर कैसे
अपवित्र हो गया ? क्या मेरे पाप तुम्हारी देवी की महानता से भी अधिक बढ़कर हैं ? क्या
मेरे मैल में तुम्हारी देवी के गौरव को नष्ट करने की शक्ति है ? क्या
मैं किसी बात में तुम्हारी पूज्या देवी से भी अधिक बढ़कर हूँ ? नहीं, यह
संभव नहीं है | अरे दुष्ट ! तुम ऐसा तुच्छ विचार करके भी अपने-आपको माँ का भक्त कहते हो | तुम्हें
लज्जा आनी चाहिए | तुम माँ की मूर्ति के सामने ही माँ के गौरव को नष्ट कर रहे हो | माँ
कभी छूत-अछूत नहीं मानती| वह तो सबकी माँ है|
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से
मुझे घेरकर पकड़ लिया;
मार-मारकर मुक्के-घूंसे
धम-से नीचे गिरा दिया!
मेरे हाथों से प्रसाद भी
बिखर गया हा! सब का सब,
हाय! अभागी बेटी तुझ तक
कैसे पहुँच सके यह अब।
शब्दार्थ-
अभागी-
भाग्यहीन
आशय-
सुखिया
का पिता अपनी बेटी की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए मंदिर में पूजा
का फूल लेने पहुँचा तो भक्तों ने उसे अछूत कहकर पकड़ लिया | उसने उनसे प्रश्न पूछा
कि क्या उसका कलुष देवी माँ की
महिमा
से भी बढ़कर है | इसके बाद-सुखिया का पिता अपनी आपबीती सुनाते हुए कहता है- देवी के
उन भक्तों ने मेरी बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया| उन्होंने तुरंत मुझे चारों ओर से घेर कर पकड़ लिया| फिर उन्होंने मुझे मुक्के-घूँसे
मार-मारकर नीचे गिरा दिया | उस मारपीट में
मेरे हाथों से देवी का प्रसाद भी बिखर गया| मैं
अपनी बेटी को याद करने लगा-हाय अभागी बेटी ! देवी का यह प्रसाद तुझ तक कैसे
पहुँचाऊँ | तू कितनी अभागी है !
न्यायालय ले गए मुझे वे,
सात दिवस का दंड विधान
मुझको हुआ; हुआ था मुझसे
देवी का महान अपमान!
मैंने स्वीकृत किया दंड वह
शीश झुकाकर चुप ही रह;
उस असीमअभियोग, दोष का
क्या उत्तर देता, क्या कह?
सात रोज ही रहा जेल में
या कि वहाँ सदिया बीतीं,
अविश्रांत बरसा करके भी
आँखें तनिक नहीं रीति।
शब्दार्थ -
दंड-विधा - दंड कि व्यवस्था।
असीम- बहुत अधिक।
अभियोग- आरोप।
सदियाँ - सैंकड़ों वर्ष।
अविश्रांत- बिना थके।
रीति- खाली हुई।
अर्थ-
सुखिया का पिता अपनी बेटी कि इच्छा पूरी करने के लिए
देवी के मंदिर में पहुँचा। उसने पूजा के फूल लिए। तभी भक्तों ने उसे पहचान लिया और उसे खूब पीटा। उसके बाद सब मिलकर उसे न्यायालय में ले गए। उस पर अछूत होकर मंदिर में प्रवेश करने का आरोप लगाया गया। न्यायालय ने उसे इस दोष के लिए सात दिनों के जेल की सजा सुनाई। न्यायालय ने कहा कि सुखिया के पिता ने जानबूझकर देवी का घोर अपमान किया है। उसके मंदिर में घुसने से देवी कि पवित्रता नष्ट हो गई है।
सुखिया के पिता ने झुकाकर दंड स्वीकार कर लिया। उस पर जो भीषण आरोप मढ़ा गया था, वह उसका क्या उत्तर देता! वह अपनी रक्षा में क्या कहता! उसे कुछ न सुझा।
वह सात दिनों तक जेल में रहा। उसके लिए ये सात दिन सैकड़ों वर्षों के समान भारी थे। उसकी आँखों से निरंतर आँसू बहते रहे। फिर भी आँखें भरी रहीं। उनकी वेदना कम नहीं हुई।
आशय-
सुखिया का पिता अपनी बेटी सुखिया की इच्छा पूरी करने के लिए देवी के मंदिर में पहुँचा | उसने पूजा के फूल के लिए | तभी भक्तों ने उसे पहचान लिया और उसे खूब पीटा | उसके
बाद सब मिलकर उसे न्यायालय में ले गए | उस पर अछूत होकर मंदिर में प्रवेश करने का
आरोप लगाया गया | न्यायालय ने उसे इस दोष के लिए सात दिनों की जेल की सजा सुनाई |
न्यायालय ने कहा कि
सुखिया
के पिता ने जानबूझकर देवी का घोर अपमान
किया है | उसके मंदिर में घुसने से देवी की पवित्रता नष्ट हुई है |
सुखिया
के
पिता ने सिर झुकाकर इस दंड को स्वीकार कर लिया
| उस
पर जो भीषण आरोप मढ़ा गया था, वह उसका क्या उत्तर देता
! वह
अपनी रक्षा में क्या कहता
! उसे
कुछ न सूझा
|
वह
सात दिनों तक जेल में रहा | उसके लिए ये सात दिन सैकड़ों वर्षों के समान भारी थे |
उसकी आँखों से निरंतर आँसू बहते रहे | फिर भी आँखें भरी रहीं | उनकी वेदना कम नहीं
हुई|
दंड भोगकर जब मैं छूटा ,
पैर न उठते थे घर को ;
पीछे ठेल रहा था कोई
भय- जर्जर तनु पंजर को |
पहले की-सी लेने मुझको
नहीं दौड़कर आई वह ;
उलझी हुई खेल मेन ही हा !
अबकी दी न दिखाई वह |
शब्दार्थ
ठेलना- धकेलना
भय जर्जर - भय से पीड़ित
तनु- शरीर
पंजर - ढांचा, हड्डियों का ढाँचा
आशय
बीमार सुखिया के लिए
उसका पिता मंद के
प्रसाद का फूल लेने गया तो उसे भक्तों ने
पकड़ लिया | न्यायालय ने उसे सात
दिन की
सजा सुनाई | इस
सजा के कारण बीमार
सुखिया चल बसी | इस दुख में डूबा हुआ
सुखिया का पिता आप बीती
सुनाते हुए
कहता है-
जब मैं
सात दिनों का कारावास काटकर छूटा तो घर जाने का मन नहीं करता था | मन में कहीं लगता था
कि अब बेटी जीवित नहीं रही | इसलिए यों लगता था जैसे कोई मेरे भय से जर्जर
अस्थि पिंजर को पीछे की ओर धकेल रहा है | मेरे पाँव घर की ओर नहीं पड रहे थे | पहले मेरी बेटी मुझे
देखते ही मुझे लिवाने के लिए दौड़ी चली आती थी, किन्तु आज ऐसा नहीं
हुआ | लगता
था कि जैसे वह किसी खेल में उलझी हुई हो | इसलिए इस बार वह मेरे स्वागत में दिखाई नहीं दी|
उसे देखने मरघट को ही
गया दौड़ता हुआ वहाँ,
मेरे परिचित
बंधु प्रथम ही
फूँक चुके
थे उसे जहाँ |
बुझी पड़ी
थी चीता वहाँ पर
छाती धधक
उठी मेरी,
हाय ! फूल-सी कोमल बच्ची
हुई राख़ की थी ढेरी!
अंतिम बार
गोद में बेटी,
तुझको ले न
सका मैं हा !
एक फूल माँ का प्रसाद भी
तुझको दे न
सका हा !
शब्दार्थ-
मरघट- श्मशान
परिचित- जान-पहचान के
बंधु- संबंधी, रिश्तेदार
फूँक- जला
धधक
उठी-
जल उठी
आशय-
बीमार सुखिया के लिए
उसका पिता मंदिर के प्रसाद का फूल लेने गया तो उसे भक्तों ने पकड़ लिया | न्यायालय ने उसे सात
दिन की सजा सुनाई | इस
सजा के कारण बीमार सुखिया चल बसी | इस दुख में डूबा हुआ सुखिया का पिता आप बीती
सुनाते हुए कहता है-
जब मैं
सात दिनों का कारावास काटकर छूटा तो घर जाने का मन नहीं करता था | मन में कहीं लगता था
कि अब बेटी जीवित नहीं रही | इसलिए यों लगता था जैसे कोई मेरे भय से जर्जर
अस्थि पिंजर को पीछे की ओर धकेल रहा है | मेरे पाँव घर की ओर नहीं पड रहे थे | पहले मेरी बेटी मुझे
देखते ही मुझे लिवाने के लिए दौड़ी चली आती थी, किन्तु आज ऐसा नहीं
हुआ | लगता
था कि जैसे वह किसी खेल में उलझी हुई हो | इसलिए इस बार वह मेरे स्वागत में दिखाई नहीं दी|
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