मंगलवार, 11 अगस्त 2020

रहीम के दोहे - रहीम

 रहीम के दोहे - रहीम 



कवि परिचय 

    रहीम का जन्म लाहौर (अब पाकिस्तान) में सन् 1556 में हुआ | इनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था| रहीम अरबी, फारसी, संस्कृत और हिन्दी के अच्छे जानकार थे| इनकी नीतिपरक उक्तियों पर संस्कृत कवियों की स्पष्ट छाप परिलक्षित होती है | मध्ययुगीन दरबारी संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं | रहीम, अकबर के दरबार में हिन्दी कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान था| रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे|

                रहीम के काव्य का मुख्य विषय शृंगार, नीति और भक्ति है | रहीम बहुत लोकप्रिय कवि थे | इनके दोहे सर्वसाधारण को आसानी से याद हो जाते है| इनके नीतिपरक दोहे ज्यादा प्रचलित है, जिनमें दैनिक जीवन के दृष्टांत देकर कवि ने उन्हें सहज, सरल और बोधगम्य बना दिया है| रहीम को अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था| इन्होंने अपने काव्य में प्रभावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है|

         रहीम की प्रमुख कृतियाँ हैं : रहीम सतसई, शृंगार, सतसई, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, बरवै, रहीम रत्नावली, भाषिक भेदवर्णन | ये सभी कृतियाँ ‘रहीम ग्रंथावली’ में समाहित है | 

     * दोहे *


 रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय |

   टूटे से फिर ना मिले, मिले तो गाँठ परि जाय ||


   रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय |

   सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय ||


   एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय |

   रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय ||


   चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस |

   जा पर बिपदा पड़त हैं, सो आवत यह देस ||


   दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं |

   ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं ||


   धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय |

   उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय ||


   नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत |

   ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत ||


   बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय |

   रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय ||


   रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिये डारि |

   जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि ||


   रहीमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय |

   बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय ||


   रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून |

   पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून ||


रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय |
टूटे से फिर ना मिले, मिले तो गाँठ परी जाय ||


कठिन शब्दार्थ- 

           चटकाय= चटका कर

              परि जाय= पड़ जाती है |

व्याख्या-

     रहीम कहते हैं- प्रेम धागे के समान अखंड और कोमल होता है | इसे कभी भी जान बूझकर तोड़ना नहीं चाहिए | यदि एक बार धागा टूट गया तो फिर जुड़ नहीं पाता | यदि जोड़ भी दिया जाए तो उसमें गाँठ पड़ जाती है | आशय यह है कि प्रेम एक बार टूट जाए तो मन में ग्रंथि रह जाती है |


रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय |   सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय ||


कठिन शब्दार्थ- 

निज= अपना ,        बिथा= दुख,व्यथा

गोय= छिपाकर,               अठिलैहैं= प्रसन्न होंगे

 लैहैं= लेंगे,                        कोय= कोई भी 


व्याख्या-

              रहीम लोगों को उपदेश देते हुए कहते हैं- लोगों ! तुम अपने मन की वेदना को अपने मन में ही छिपाकर रखो | उसे किसी के सामने प्रकट मत करो| यह संसार बहुत निर्दय है | लोग तुम्हारे कष्ट को सुनकर प्रसन्न ही होंगे | कोई भी मनुष्य तुम्हारे दुख को कम करने के लिए प्रयत्न नहीं करेगा | 

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय |
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय || 

कठिन शब्दार्थ- 

      साधे= साधने पर,                    सधै= सध जाते हैं

      जाय= चले जाते  हैं, नष्ट हो जाते हैं

      मूलहिं=मूल को, जड़ को,         सींचिबो= सींचने से

      फूलै= फूलों से,       फलै= फलों से,       अघाय= तृप्त
 
व्याख्या-

       रहीम कहते हैं कि एक परमात्मा को पा लेने से अन्य सब सांसारिक उपलब्धियाँ स्वयमेव प्राप्त हो जाती है | परंतु यदि परमात्मा की भक्ति न की और अन्य सांसारिक वस्तुओं को पा लिया तो वे सब उपलब्धियाँ परमात्मा के अभाव में कुछ काम नहीं आतीं या नष्ट हो जाती हैं| इसलिए रहीम जी कहते हैं कि हे मनुष्य! तुम जड़ को सींचो | उसी से तुम फल-फूल पाकर तृप्त हो सकोगे| आशय यह है कि जो व्यक्ति इस सृष्टि के मूल परमात्मा को ध्याता है, वह सब प्रकार के सांसारिक फलों को पाकर तृप्त हो जाता है | 

चित्रकूट में रमि रहे,  रहिमन अवध-नरेस |
जा पर बिपदा पडत हैं,   सो आवत यह देस ||

कठिन शब्दार्थ- 

रमि रहे= लीन हो गए, रम गए

अवध नरेश= अयोध्या के राजा राम

 जा पर= जिस पर,                           बिपदा=संकट      सो=वह

  आवत= आता है,                            देस= प्रदेश, क्षेत्र 


व्याख्या-

        रहीम कहते हैं- यह चित्रकूट अत्यंत मनोरम तथा धार्मिक प्रदेश है | जिस पर भी विपत्ति आती है, वही शांति पाने के लिए इस प्रदेश में खिंचा  चला आता है| देखिए, अयोध्या के राजा राम पर विपत्ति पड़ी, उन्हें राजपाट छोड़कर वनों में जाना पड़ा तो वे चित्रकूट में चले आए |    अब वे पूरी तरह इस प्रदेश में रम गए हैं | उनका  मन यहाँ रम गया है | 


दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं |
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं ||


कठिन शब्दार्थ- 

दीरघ= लंबा,      अरथ= अर्थ            आखर= अक्षर

थोरे= थोड़े,              आहिं= होते है                      नट= कलाकार

कुंडली= घेरा, गोल आकार का लोहे का चक्का जो अंदर से खाली होता है    

सीमिटि= सिकुड़कर               चढ़ि= निकल 


व्याख्या-

       रहीम कहते हैं- दोहा छंद ऐसा है जिसमें अक्षर तो थोड़े होते हैं किन्तु उनमें बहुत गहरा और दीर्घ अर्थ छिपा रहता है| जिस प्रकार कोई कुशल बाजीगर अपने शरीर को सिकोड़कर तंग मुँह वाली कुंडली के बीच में से कुशलतापूर्वक निकल जाता है उसी प्रकार कुशल दोहाकार दोहे के सीमित-से शब्दों में बहुत बड़ी और गहरी बात कह जाता है|


धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय |
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय ||


कठिन शब्दार्थ- 

धनि= धन्य                 पंक= कीचड़,       

लघु जिय=छोटे जीव          पिअत= पीकर,     

अघाय= प्यास बुझाकर        उदधि= समुद्र,  

बड़ाई= महानता,             जगत= संसार            पिआसो= प्यासा


व्याख्या-
         रहीम कहते हैं- मेरी दृष्टि में कीचड़ का जल भी धन्य है क्योंकि उससे कितने ही लघु जीव अपनी प्यास बुझाते हैं| समुद्र की महानता किस काम की, जिसका जल पीने योग्य नहीं है | संसार के लोग उसके किनारे आकर भी प्यासे के प्यासे रह जाते हैं | आशय यह है कि महान वही है जो किसी के काम आए |

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत |
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत ||

कठिन शब्दार्थ- 

नाद=संगीत,धुन             रीझि=प्रसन्न होकर         

तन= शरीर                 मृग=हिरण        

हेत= कल्याण-कामना         समेत= सहित


व्याख्या-

       रहीम कहते हैं- संगीत की मोहिनी तान पर झूमते हुए हिरण अपने प्राण तक न्योछावर कर देता है| इसी प्रकार किसी की कला पर मुग्ध होकर मनुष्य उस पर प्रेम सहित धन अर्पित कर देता है| परंतु वे मनुष्य तो पशु से भी अधिक जड़ हैं जो किसी पर रीझकर भी उसे कुछ नहीं देते |


बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय |
रहिमन फाटे दूध को,
मथे
न माखन होय ||


कठिन शब्दार्थ- 

बिगरी बात= बिगड़ी हुई बात ,      

करौ किन कोय= कोई कुछ भी क्यों न करै

फाटे= फटे हुए                     मथे= मथने पर 


व्याख्या-

           रहीम कहते है- एक बार जो बात बिगड़ जाती है, वह लाख प्रयत्न करने पर भी सँवरती नहीं है| उदाहरण है- यदि एक बार दूध फट जाए तो उसे कितना भी मथो, लेकिन उसमें से मक्खन नहीं निकलता| 


रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिये डारि |
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि ||


कठिन शब्दार्थ-

बड़ेन= बड़ों,                लघु= छोटा 

डारि= डाल, फेंक, त्याग              कहा करे= क्या करेगी

तरवारि= तलवार 
व्याख्या-

         रहीम कहते हैं- हमें बड़े लोगों के सामने देखकर छोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए | छोटों का भी अपना महत्व होता है | उदाहरण के रूप में, जहाँ सुई का प्रयोग होता है, वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती | अतः छोटों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए |


रहीमन निज संपति बिना, कोन बिपति सहाय |बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय||


कठिन शब्दार्थ- 

निज= अपनी         बिपति= संकट     

सहाय= सहायक              जलज= कमल   

 रवि= सूर्य 


व्याख्या-

         रहीम कहते हैं कि संकट की स्थिति में मनुष्य की निजी धन-दौलत  ही उसकी सहायता करती है | जिस प्रकार पानी का अभाव होने पर सूर्य कमल की कितनी ही रक्षा करने की कोशिश करे, किन्तु उसे बचाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार मनुष्य को बाहरी सहायता कितनी ही क्यों न मिले, किन्तु उसकी वास्तविक रक्षक तो निजी संपत्ति होती है |


रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून |
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून
 
||

कठिन शब्दार्थ- 

पानी= चमक, सम्मान, जल

सून= व्यर्थ, शून्य                              ऊबरै= उभरे, चमके

मानुष= मनुष्य                                  चून= आटा


व्याख्या-

      रहीम कहते हैं- पानी का बहुत महत्त्व  हैं | इसे बनाए रखो | यदि समाप्त हो गया तो न तो मोती का कोई महत्त्व रह जाता है, न मनुष्य का और न आटे का | पानी अर्थात् चमक के बिना मोती बेकार है, पानी अर्थात्  सम्मान के बिना मनुष्य-जीवन व्यर्थ है और जल के बिना रोटी नहीं बन सकती, इसलिए आटा बेकार है |


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