मंगलवार, 11 अगस्त 2020

गीत-अगीत - रामधारी सिंह दिनकर |

 गीत-अगीत  

 रामधारी सिंह 'दिनकर' |


कवि परिचय 

                        रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में 30 सितंबर 1908 को हुआ | वे सन् 1952 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए | भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से भी अलंकृत किया| दिनकर जी को  ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार

 मिला | अपनी काव्यकृति ‘उर्वशी’ के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार  से सम्मानित किया गया|

           दिनकर की प्रमुख कृतियाँ हैं- हुंकार, कुरुक्षेत्र, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी और संस्कृति के चार अध्याय |

          दिनकर जी की भाषा अत्यंत प्रवाहपूर्ण, ओजस्वी और सरल है | दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता है अपने देश और युग के सत्य के प्रति सजगता | दिनकर में  विचार और संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है | इनकी कुछ कृतियों में प्रेम और सौंदर्य का भी चित्रण है |


गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

गाकर गीत विरह के तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कह जाती है |
तट पर एक गुलाब सोचता,
“देते स्वर यदि मुझे
विधाता,
अपने
पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता |”


गा-गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल 
मूक खड़ा तट पर है |

गीत, अगीत कौन सुंदर है ?


शब्दार्थ 

अगीत- जो गाया नहीं गया, मौन गान
विरह- वियोग, बिछोह
तटिनी- नदी
वेगवती- गतिमयी , तेज गति से चलनेवाली
उपलों- किनारों 
स्वर- आवाज़
विधाता- ईश्वर
जग- संसार
निर्झरी- झरना, नदी 
पाटल- गुलाब

मूक- मौन, चुप

आशय

          कवि पाठक से प्रश्न करता है- हे पाठकों ! तुम्हीं बताओ | गीत और अगीत में से तुम किसे सुंदर मानते हो| नदी को देखो | वह वेगवती है | वह विरह के गीत गाती हुई निरंतर बहती चली जाती है | वह अपने दुख का भार हलका करने के लिए अपने किनारों को कलकल स्वर में कुछ-कुछ कहती चली जाती है | उधर किनारे पर खड़ा हुआ गुलाब का फूल सोचता है- यदि  भगवान ने मुझे भी स्वर दिया होता तो मैं सारे संसार को पतझड़ के दुख-भरे दिनों की पीड़ा अवश्य सुनाता | परंतु अफसोस ! मेरी पीड़ा मन ही में रह जाती है|

                इस प्रकार नदी गा-गाकर बहती चली जा रही है और गुलाब का फूल नदी के किनारे मौन भाव से खड़ा है | दोनों सुंदर हैं | परंतु बताओ, दोनों में कौन अधिक सुंदर है ?


बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो
खोंते पर छाया देती |
पंख फुला नीचे खोंते में
शूकी बैठ अंडे है सेती |
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर |
किन्तु, शूकी के गीत उमड़कर
रह जाते सनेह में सनकर |

गूँज रहा शुक का स्वर वन में,
फुला मग्न शूकी का पर है |

गीत, अगीत, कौन सुंदर है ? 


शब्दार्थ  

शुक – तोता

घनी – अधिक पत्तों वाली
खोता – घोंसला
पर्ण – पत्ता
शूकी – मादा तोता
सनेह- प्रेम
सनकर – डूबकर

मग्न – तल्लीन 


आशय

             कवि कहता है- शुक वृक्ष की उस घनी डाली पर बैठा है जिसकी छाया उसके घोंसले पर पड रही है | उसी घोंसले में शूकी भी बैठी है | वह अपने पंख फुलाकर अपने अंडों को से रही है | जब सूरज की  वसंती किरण पत्तों से छनकर आती है और उसके अंगों को छूती है तो वह प्रसन्न होकर गा उठता है | उधर शूकी भी गाना चाहती है | किन्तु उसके मन में उठने वाले गीत प्रेम और वात्सल्य में ही डूबकर रह जाते हैं | वह अपने बच्चों के स्नेह में डूबी-डूबी उन गीतों को अंदर-ही-अंदर अनुभव करती है |

               देखो, शुक का स्वर वन में चारों ओर गूँज रहा है, किन्तु शूकी अपने पंखों को अंडों पर फुलाए हुए मग्न है | दोनों ही सुंदर है | शुक का स्नेह मुखर है और शूकी का मौन | एक का स्वर ‘गीत’ कहलाता है | दूसरे का मौन ‘अगीत’ कहलाता है | बताइए, इन दोनों में कौन-सा सुंदर है |


दो प्रेमी है यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्हा गाता है,
पहला स्वर उसकी राधा को
घर से यहाँ खींच लाता है |
चोरी-चोरी खड़ी नीम की
छाया में छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है |

वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है |

गीत, अगीत, कौन सुंदर है ?


शब्दार्थ 

आल्हा - एक लोक-काव्य का नाम
कड़ी – गीत की एक पंक्ति
बिधना – विधाता, ईश्वर
गुनती – सोचती
वेग- गति

अंतर – हृदय, दिल 

आशय

¨          कवि कहता है- दो प्रेमीयों के प्रेम का अंतर देखो | एक प्रेमी साँझ होते ही आल्हा गीत गाने लगता हैं | जैसे ही उसके मुख से आल्हा का पहला स्वर फूटता है, वैसे ही उसकी राधा घर से वहाँ खींची चली आती है | वह नीम की छाया में छिपकर उसका वह मधुर गीत सुनती है | गीत पर मुग्ध होकर वह सोचती है- हे विधाता ! मैं इस मधुर गीत की पंक्ति ही क्यों न बन गई ? काश ! मैं इसके  मधुर गीत में खो जाती | देखो, प्रेमी गाता है और उसके गान को सुनकर उसकी प्रेमिका का हृदय नाच उठता है | एक का प्रेम प्रकट है तो दूसरी का मौन ! एक गाया जाने के कारण ‘गीत’ है तो दूसरा मौन होने के कारण ‘अगीत’ है | बताओं, इन दोनों मेन कौन अधिक सुंदर है !    

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