नए इलाके में -
अरुण कमल
कवि परिचय
अरुण कमल का जन्म
बिहार के रोहतास जिले के नासरीगंज में 15 फरवरी 1954 को हुआ | ये इन दिनों पटना
विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं | इन्हें अपनी कविताओं के लिए साहित्य अकादमी
पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया | इन्होंने कविता-लेखन के अलावा कई
पुस्तकों और रचनाओं का अनुवाद भी किया है |
अरुण कमाल की प्रमुख कृतियाँ हैं : अपनी
केवल धार, सबूत,
नए इलाके में,
पुतली में संसार
(चारों कविता-संग्रह) तथा कविता और समय (आलोचनात्मक कृति) इनके अलावा अरुण कमल ने
मायकोव्यस्की की आत्मकथा और जंगल बुक का हिन्दी में और हिन्दी के युवा कवियों की
कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जो ‘वॉयसेज’ ’ नाम से प्रकाशित हुआ |
इन नए बसते इलाकों
में
जहाँ रोज़ बन रहे हैं नए-नए मकान
मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ
धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढहा हुआ घर
और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंजिला
और मैं हर बार एक घर पीछे
चल देता हूँ
या दो घर आगे ठकमकाता
शब्दार्थ-
आशय –
कवि किसी नई बस्ती
में पहुँचता है तो प्रायः रास्ता भूल जाता है हैं, कारण यह है कि वहाँ रोज़ नए-नए मकान बन रहे
हैं | इसलिए
उसने आने-जाने के रास्तों और ठिकानों तक पहुँचने के लिए जो निशान बनाए होते थे,
वे अब काम नहीं आते |
वह पीपल का पुराना
पेड़ खोजता है या कोई टूटा हुआ घर ढूँढता है या जमीन का कोई खाली टुकड़ा ढूँढता है,
जहाँ से उसे बाएँ
हाथ की तरफ मुड़ना था | परंतु बहुत समय बाद न तो पीपल का पेड़ रहा | उसे लोगों ने उखाड़ दिया | न गिरा हुआ घर रहा |
वहाँ किसी ने नया
मकान बना लिया | न जमीन का खाली टुकड़ा रहा, क्योंकि वहाँ भी किसी ने मकान बना लिया | अतः उसकी सारी
पुरानी निशानियाँ गायब हो गई | उसे याद था कि खाली प्लाट के दो मकान के बाद
एकमंज़िला मकान था जिसके बाहर बिना रंग वाला लोहे का फाटक लगा था | परंतु अब वह
एकमंजिला मकान दुमंजिला हो गया और उसका फाटक सज-धज गया | इसलिए वह अकसर ठिकाना भूलकर या तो अपने घर
से एकाध घर पहले ही मुड़ जाता है या घर से दो घर आगे पहुँच जाता है |
यहाँ रोज़ कुछ बन रहा है
रोज़ कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ
जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ
अब यही है उपाय कि हर दरवाज़ा खटखटओ
और पूछो-क्या यही है वो घर ?
समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढहा आ रहा अकास
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर |
शब्दार्थ-
घट- घटित होना,
होना
स्मृति- याद
वसंत- एक मनमोहक ऋतु
पतझड़- एक ऋतु जिसमें पेड़ के पत्ते झड़ जाते
हैं
बैसाख- चैत्र के बाद वाला महीना
भादों- सावन के बाद आने वाला महीना
अकास- आकाश
आशय –
कवि कहता है- नए इलाके की नई बस्ती में
रोज़ ही कुछ नया बन जाता है | और कुछ नए मकान बन जाते हैं | नई घटनाएँ घट जाती
हैं | इसलिए
यहाँ पुरानी जगह ढूँढने के लिए अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं किया जा सकता |
पुरानी यादें,
पुरानी निशानियाँ
बेमानी हो जाती हैं | बदली हुई स्थितियों में वे काम ही नहीं आतीं | एक ही दिन में इतना नया निर्माण हो जाता
है कि कल बनी जगहें पुरानी पड़ जाती हैं | पुरानी यादों के सहारे जब नए इलाके में जाता हूँ
तो ऐसा आश्चर्य होता है मानो मैं वसंत के मौसम में वहाँ गया था और लौटा हूँ तो
पतझड़ हो गई है | मानो बैसाख के महीने में बस्ती में गया था और लौटते-लौटते भादों आ गई
है | आशय यह
है कि नई बस्ती में बड़ी तेजी से बदलाव आ रहा है |
अब तो इन बस्तियों में अपना ठिकाना तलाशने
का यही एक उपाय है कि लोगों के घर-घर जाया जाए और उनसे पूछा जाए कि क्या यह वही घर
है जिसे मैं ढूँढ रहा हूँ | परंतु तुम्हारे पास बहुत कम समय है | तुम पूछते हुए भी
यों घबरा रहे हो मानो बाढ़ आने वाली हो या आकाश ढहा जा रहा हो | तुम्हें इस बात का
इंतजार है कि शायद तुम्हारा कोई जाना-पहचाना आदमी तुम्हें पहचान ले और तुम्हारा
नाम पुकार कर बुला ले |

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