खुशबू रचते हैं हाथ
- अरुण कमल
कई गलियों के बीच
कई नालों के पार
कूड़े-करकट
के ढेरों के बाद
बदबू से फटते जाते
इस
टोले के अंदर
खुशबू रचते हैं हाथ |
शब्दार्थ –
नाला – घरों और सडाकों के
किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाया रास्ता
कूड़ा-करकट – कचरा, रद्दी, गंदगी
टोला – छोटी बस्ती
आशय -
कवि कहता है- जो हाथ
खुशबू फैलाने वाली अगरबत्तियों का निर्माण करते हैं वे स्वयं कैसी बदबूदार
बस्तियों में रहते हैं | उन्हें कई गलियों के बीच, अनेक नालों को पार करने बाद कूटे-करकट और
गंदगी के ढेरों के आसपास वहाँ रहना पड़ता है, जहाँ उनकी नाक बदबू के मारे फटने को हो
जाती है |
उभरी नसोंवाले हाथ
घिसे नाखूनोंवाले हाथ
पीपल के पत्ते-से नए-नए हाथ
जूही की डाल-से खुशबूदार हाथ
गंदे कटे-पिटे हाथ
ज़ख्म से फटे हुए हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ |
शब्दार्थ –
जूही- एक फूल
ज़ख्म- घाव
आशय -
कवि कहता
है- जो मजदूर खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं और सारे संसार को खुशबू से महका देते
हैं, वे
तरह-तरह के हैं | उनमें वे बूढ़े-बुढ़ियाँ भी हैं जिनके हाथों की नसें उभर चुकी हैं या
जिनके हाथों के नाखून काम करते-करते घिस चुके हैं | अगरबत्तियाँ बनाने वालों में वे नन्हें
बालक-बालिकाएँ भी हैं जिनके हाथ पीपल के पत्तों के समान कोमल हैं | उनमें वे नवयुवतियाँ
भी हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाली के
समान खुशबूदार हैं | इनमें काम की अधिकता के कारण गंदे हाथों वाले और कटे हाथों वाले मज़दूर
भी हैं और अपने मालिक, पति या पिता की मार खाए हुए हाथ भी हैं | कुछ मज़दूर ऐसे हैं ‘जिनके हाथों में घाव हो चुका हैं |’
फिर भी वे काम किए
जा रहे हैं | इतनी विपत्तियों के बावजूद ये काम करते चले जा रहे हैं |
यहीं इस गली में बनती हैं
मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ
इन्हीं गंदे मुहल्लों के गंदे लोग
बनाते हैं केवड़ा गुलाब खस और रातरानी अगरबत्तियाँ
दुनिया की सारी गंदगी के बीच
दुनिया की सारी खुशबू
रचते रहते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ |
शब्दार्थ-
मुल्क- देश
केवड़ा- एक छोटा वृक्ष जिसके फूल सुगंधित होते हैं
खस- पोस्त
रातरानी- रात में सुगंध देने वाला एक फूल
आशय –
कवि कहता है- देखो,
कैसा व्यंग्य है !
देश की प्रसिद्ध अगरबत्तियाँ इस गंदी तंग बदबूदार गली में बनती हैं | इन्हीं गंदे
मुहल्लों में रहने वाले गंदे लोग केवड़ा, गुलाब, पोस्ता और रातरानी की सुगंध वाली महमहाती
अगरबत्तियाँ बनाते हैं | यद्यपि वे दुनिया भर की गंदगी के बीचोंबीच रहते
हैं और जीते हैं किन्तु अपने हाथों से दुनिया को महमह करने वाली खुशबूदार
अगरबत्तियाँ बनाते हैं | इस प्रकार वे स्वयं गंदे रहकर भी खुशबू बाँटते
हैं | जी, हाँ ये ही श्रमिक
खुशबू पैदा करते हैं, खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं और सुगंध बिखेरते हैं |

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