रैदास के पद
जीवन परिचय
रैदास नाम से विख्यात संत रैदास का जन्म सन् 1318 में बनारस में हुआ, ऐसा माना जाता है | इनकी ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था| मध्ययुगीन साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है | कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के कवियों में गिने जाते हैं | मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का जरा भी विश्वास न था| वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे |
कृतित्व
रैदास ने अपनी काव्य रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी , राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है | रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं | सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के सारे भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए हैं | इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं | रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित हैं |
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी |
प्रभु जी, तुम चन्दन
हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी |
प्रभु जी, तुम घन बन
हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा |
प्रभु जी, तुम दीपक
हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती |
प्रभु जी, तुम मोती
हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा |
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा ||
कठिन शब्द
रट लागी -आदत लग गई
जाकी- जिसकी
बास- सुगंध
समानी- समा गई
घन – बादल
चंद- चाँद
चकोरा- तितर जाती का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है |
बाती- रुई की बत्ती
जोति-लौ
बरै- जलती है
सोनहिं - सोने से
सुहागा-सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में लाया जानेवाला क्षार |
दासा- सेवक
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी
अर्थात-
हे प्रभु ! हमारे मन में जो आपके नाम की रट लग गई है, वह कैसे छूट सकती है ? अब तो मैं तुम्हारा परम भक्त हो गया हूँ |
प्रभु जी, तुम चन्दन
हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी |
अर्थात –
तुममें और मुझमें वही संबंध स्थापित हो चुका है जो चंदन और पानी में होता है | जैसे चंदन के संपर्क में रहने से पानी में उसकी सुगंध फैल जाती है, उसी प्रकार मेरे तन-मन में तुम्हारे प्रेम की सुगंध व्याप्त हो गई है | मैं पानी हूँ, तुम चन्दन हो |
प्रभु जी, तुम घन बन
हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा |
अर्थात-
प्रभु जी ! तुम आकाश में छाए काले बादलों के समान हो, मैं जंगल में नाचने वाला मोर हूँ | जैसे वर्षा बरसाते बादलों को घुमड़ते देखकर मोर खुशी से नाचने लगते हैं, उसी भाँति मैं आपके दर्शन पाकर खुशी से भावमुग्ध हो उठता हूँ | हे प्रभु जी ! जैसे चकोर पक्षी सदा अपने प्रेम पात्र चंद्रमा की ओर ताकता रहता है उसी भाँति मैं भी सदा तुम्हारा प्रेम पाने के लिए तरसता रहता हूँ | आप चंद्रमा हो तो मैं चकोर हूँ |
प्रभु जी, तुम दीपक
हम बाती, जाकी जोति बरे दिन राती |
अर्थात-
हे प्रभु ! तुम दीपक हो,
मैं
तुम्हारी बाती हूँ | मैं बाती के समान सदा तुम्हारे प्रेम में जलता
रहता हूँ | तुम्हारे प्रेम की चमक दिन-रात मेरे मन में समाई रहती है|
प्रभु जी, तुम मोती
हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा |
अर्थात-
प्रभु ! तुम मोती के समान उज्ज्वल, पवित्र और सुंदर हो | मैं उसमें पिरोया हुआ धागा हूँ | मेरा तन-मन तुम्हारी कान्ति से ओतप्रोत है | तुम्हारा और मेरा मिलन सोने और सुहागे के मिलन के समान पवित्र है | जैसे सुहागे के संपर्क में आकार सोना और अधिक खरा हो जाता है, उसी भाँति मैं तुम्हारे संपर्क में रहने से शुद्ध-बुद्ध हो जाता हूँ |
प्रभु जी, तुम
स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करे रैदासा |
अर्थात-
हे प्रभु जी ! तुम मेरे स्वामी हो, मैं तुम्हारा दास हूँ, सेवक हूँ | मैं रविदास, तुम्हारे चरणों में इसी प्रकार की दास्य भक्ति अर्पित करता हूँ |
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अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी - काव्य के प्रशानोत्तर

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