रविवार, 9 अगस्त 2020

अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी - रैदास

 

रैदास के पद


जीवन परिचय

                            रैदास नाम से विख्यात संत रैदास का जन्म सन् 1318 में बनारस में हुआ, ऐसा माना जाता है | इनकी ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था| मध्ययुगीन  साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है | कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के कवियों में गिने जाते हैं | मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का जरा भी विश्वास न था| वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे |

कृतित्व

                           रैदास ने अपनी काव्य रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी , राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है | रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं | सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के सारे भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए हैं | इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं | रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहबमें भी सम्मिलित हैं |   

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी 

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी |

प्रभु जी, तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी |

प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा |

प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती |

प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा |

प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै  रैदासा ||


कठिन शब्द

रट लागी -आदत लग गई     

जाकी- जिसकी

बास- सुगंध                 

समानी- समा गई

घन बादल               

चंद- चाँद

चकोरा- तितर जाती का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है |

बाती- रुई की बत्ती       

जोति-लौ

बरै- जलती है                

सोनहिं - सोने से

सुहागा-सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में लाया जानेवाला क्षार |

दासा- सेवक

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी

अर्थात-

   हे प्रभु ! हमारे मन में जो आपके नाम की रट लग गई है, वह कैसे छूट सकती है ? अब तो मैं तुम्हारा परम भक्त हो गया हूँ |

प्रभु जी, तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी |

अर्थात

         तुममें और मुझमें वही संबंध स्थापित हो चुका है जो चंदन और पानी में होता है | जैसे चंदन के संपर्क में रहने से पानी में उसकी  सुगंध फैल जाती है, उसी प्रकार मेरे तन-मन में तुम्हारे प्रेम की सुगंध व्याप्त हो गई है | मैं पानी हूँ, तुम चन्दन हो |

प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा |

अर्थात-

          प्रभु जी ! तुम आकाश में छाए काले बादलों के समान हो, मैं जंगल में नाचने वाला मोर हूँ | जैसे वर्षा बरसाते बादलों को घुमड़ते देखकर मोर खुशी से नाचने लगते हैं, उसी भाँति मैं आपके दर्शन पाकर खुशी से भावमुग्ध हो उठता हूँ | हे प्रभु जी ! जैसे चकोर पक्षी सदा अपने प्रेम पात्र चंद्रमा की ओर ताकता रहता है उसी भाँति मैं भी सदा तुम्हारा प्रेम पाने के लिए तरसता रहता हूँ | आप चंद्रमा हो तो मैं चकोर हूँ |

प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरे दिन राती |

अर्थात-

    हे प्रभु ! तुम दीपक हो, मैं तुम्हारी बाती हूँ | मैं बाती के समान सदा तुम्हारे प्रेम में जलता रहता हूँ | तुम्हारे प्रेम की चमक दिन-रात मेरे मन में समाई रहती है|  

प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा |

अर्थात-

    प्रभु ! तुम मोती के समान उज्ज्वल, पवित्र और सुंदर हो | मैं उसमें पिरोया हुआ धागा हूँ | मेरा तन-मन तुम्हारी  कान्ति से ओतप्रोत है | तुम्हारा और मेरा मिलन सोने और सुहागे के मिलन के समान  पवित्र है | जैसे सुहागे के संपर्क में आकार सोना और अधिक खरा हो जाता है, उसी भाँति मैं तुम्हारे संपर्क में रहने से शुद्ध-बुद्ध हो जाता हूँ |

प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करे रैदासा |

अर्थात-  

     हे प्रभु जी ! तुम मेरे स्वामी हो, मैं तुम्हारा दास हूँ, सेवक हूँ | मैं रविदास, तुम्हारे चरणों में इसी प्रकार की दास्य भक्ति अर्पित करता हूँ |


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अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी - काव्य के प्रशानोत्तर




 

 

 

 

 

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