मंगलवार, 11 अगस्त 2020

गीत-अगीत - रामधारी सिंह दिनकर |

 गीत-अगीत  

 रामधारी सिंह 'दिनकर' |


कवि परिचय 

                        रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में 30 सितंबर 1908 को हुआ | वे सन् 1952 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए | भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से भी अलंकृत किया| दिनकर जी को  ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार

 मिला | अपनी काव्यकृति ‘उर्वशी’ के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार  से सम्मानित किया गया|

           दिनकर की प्रमुख कृतियाँ हैं- हुंकार, कुरुक्षेत्र, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी और संस्कृति के चार अध्याय |

          दिनकर जी की भाषा अत्यंत प्रवाहपूर्ण, ओजस्वी और सरल है | दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता है अपने देश और युग के सत्य के प्रति सजगता | दिनकर में  विचार और संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है | इनकी कुछ कृतियों में प्रेम और सौंदर्य का भी चित्रण है |


गीत, अगीत, कौन सुंदर है?

गाकर गीत विरह के तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कह जाती है |
तट पर एक गुलाब सोचता,
“देते स्वर यदि मुझे
विधाता,
अपने
पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता |”


गा-गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल 
मूक खड़ा तट पर है |

गीत, अगीत कौन सुंदर है ?


शब्दार्थ 

अगीत- जो गाया नहीं गया, मौन गान
विरह- वियोग, बिछोह
तटिनी- नदी
वेगवती- गतिमयी , तेज गति से चलनेवाली
उपलों- किनारों 
स्वर- आवाज़
विधाता- ईश्वर
जग- संसार
निर्झरी- झरना, नदी 
पाटल- गुलाब

मूक- मौन, चुप

आशय

          कवि पाठक से प्रश्न करता है- हे पाठकों ! तुम्हीं बताओ | गीत और अगीत में से तुम किसे सुंदर मानते हो| नदी को देखो | वह वेगवती है | वह विरह के गीत गाती हुई निरंतर बहती चली जाती है | वह अपने दुख का भार हलका करने के लिए अपने किनारों को कलकल स्वर में कुछ-कुछ कहती चली जाती है | उधर किनारे पर खड़ा हुआ गुलाब का फूल सोचता है- यदि  भगवान ने मुझे भी स्वर दिया होता तो मैं सारे संसार को पतझड़ के दुख-भरे दिनों की पीड़ा अवश्य सुनाता | परंतु अफसोस ! मेरी पीड़ा मन ही में रह जाती है|

                इस प्रकार नदी गा-गाकर बहती चली जा रही है और गुलाब का फूल नदी के किनारे मौन भाव से खड़ा है | दोनों सुंदर हैं | परंतु बताओ, दोनों में कौन अधिक सुंदर है ?


बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो
खोंते पर छाया देती |
पंख फुला नीचे खोंते में
शूकी बैठ अंडे है सेती |
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर |
किन्तु, शूकी के गीत उमड़कर
रह जाते सनेह में सनकर |

गूँज रहा शुक का स्वर वन में,
फुला मग्न शूकी का पर है |

गीत, अगीत, कौन सुंदर है ? 


शब्दार्थ  

शुक – तोता

घनी – अधिक पत्तों वाली
खोता – घोंसला
पर्ण – पत्ता
शूकी – मादा तोता
सनेह- प्रेम
सनकर – डूबकर

मग्न – तल्लीन 


आशय

             कवि कहता है- शुक वृक्ष की उस घनी डाली पर बैठा है जिसकी छाया उसके घोंसले पर पड रही है | उसी घोंसले में शूकी भी बैठी है | वह अपने पंख फुलाकर अपने अंडों को से रही है | जब सूरज की  वसंती किरण पत्तों से छनकर आती है और उसके अंगों को छूती है तो वह प्रसन्न होकर गा उठता है | उधर शूकी भी गाना चाहती है | किन्तु उसके मन में उठने वाले गीत प्रेम और वात्सल्य में ही डूबकर रह जाते हैं | वह अपने बच्चों के स्नेह में डूबी-डूबी उन गीतों को अंदर-ही-अंदर अनुभव करती है |

               देखो, शुक का स्वर वन में चारों ओर गूँज रहा है, किन्तु शूकी अपने पंखों को अंडों पर फुलाए हुए मग्न है | दोनों ही सुंदर है | शुक का स्नेह मुखर है और शूकी का मौन | एक का स्वर ‘गीत’ कहलाता है | दूसरे का मौन ‘अगीत’ कहलाता है | बताइए, इन दोनों में कौन-सा सुंदर है |


दो प्रेमी है यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्हा गाता है,
पहला स्वर उसकी राधा को
घर से यहाँ खींच लाता है |
चोरी-चोरी खड़ी नीम की
छाया में छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है |

वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है |

गीत, अगीत, कौन सुंदर है ?


शब्दार्थ 

आल्हा - एक लोक-काव्य का नाम
कड़ी – गीत की एक पंक्ति
बिधना – विधाता, ईश्वर
गुनती – सोचती
वेग- गति

अंतर – हृदय, दिल 

आशय

¨          कवि कहता है- दो प्रेमीयों के प्रेम का अंतर देखो | एक प्रेमी साँझ होते ही आल्हा गीत गाने लगता हैं | जैसे ही उसके मुख से आल्हा का पहला स्वर फूटता है, वैसे ही उसकी राधा घर से वहाँ खींची चली आती है | वह नीम की छाया में छिपकर उसका वह मधुर गीत सुनती है | गीत पर मुग्ध होकर वह सोचती है- हे विधाता ! मैं इस मधुर गीत की पंक्ति ही क्यों न बन गई ? काश ! मैं इसके  मधुर गीत में खो जाती | देखो, प्रेमी गाता है और उसके गान को सुनकर उसकी प्रेमिका का हृदय नाच उठता है | एक का प्रेम प्रकट है तो दूसरी का मौन ! एक गाया जाने के कारण ‘गीत’ है तो दूसरा मौन होने के कारण ‘अगीत’ है | बताओं, इन दोनों मेन कौन अधिक सुंदर है !    

सोमवार, 10 अगस्त 2020

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै - रैदास

 ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै 

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै |

गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ||

जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै |

नीचहु ऊच करै मेरा गोबिन्दु काहू ते न डरै ||

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै |

कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै || 


 

कठिन शब्दार्थ 

लाल- स्वामी                कउनु- कौन

गरीब निवाजु- दीन-दुखियों पर कृपा करने वाला

 गुसईआ-  स्वामी

 माथै छत्रु धरै-      मस्तक पर स्वामी होने का मुकुट धारण करता है | 

 छोति-      छुआछूत, अश्पृश्यता 

जगत कऊ लागै-  संसार के लोगों को लगती है |

ता पर तुहीं ढरै-  उन पर द्रवित होता है

नीचहु च करै-  नीच को भी ऊँची पदवी प्रदान करता है

नामदेव-   महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध संत, इन्होंने मराठी और हिन्दी दोनों भाषाओं में  रचना की है |

तिलोचनु-  एक प्रसिद्ध  वैष्णव आचार्य, जो ज्ञानदेव और नामदेव के गुरु थे |

सधना-   एक उच्च कोटी के संत जो नामदेव के समकालीन माने जाते हैं

सैनु-    ये सभी प्रसिद्ध संत हैं, आदि ‘गुरुग्रंथ साहब’ में संगृहीत पद के आधार पर इन्हें रामानन्द का समकालीन माना जाता है |

हरीजीउ-   हरि जी से 

सभै सरे-   सब कुछ संभव हो जाता है |


ऐसी लाल तुझ बिनु कौनु करै  |
गरीब
निवाजु  गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै  ||

अर्थात -  

    रैदास अपने प्रभु की कृपालुता को स्वीकार करते हुए कहते हैं - हे प्रभु ! तुम्हारे बिना कौन ऐसा कृपालु है जो भक्त के लिए इतना बड़ा कार्य कर सके | तुम गरीबों पर तथा दीन दुखियों पर कृपा करने वाले हो |


जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै |
नी
चहु करै मेरा गोबिन्दु काहू ते न डरै ||

अर्थात -   

  तुम ही ऐसे कृपालु स्वामी हो जिसने मुझ जैसे अछूत और नीच के माथे पर राजाओं जैसा छत्र रख दिया, अर्थात तुम्हीं ने मुझे राजाओं जैसा सम्मान प्रदान किया | मैं वह अभागा हूँ जिसको छूने मात्र से सारे संसार को दोष लगता है, तब भी हे स्वामी ! तुमने मुझ पर असीम कृपा की | मुझ पर द्रवित हो गए | हे गोविंद ! तुमने मुझ जैसे नीच प्राणी को इतना उच्च सम्मान प्रदान किया | सचमुच तुम्हें किसी का भी भय नहीं  है |

जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै |
नीचहु करै मेरा गोबिन्दु काहू ते न डरै ||
अर्थात 
       तुम ही ऐसे कृपालु स्वामी हो जिसने मुझ जैसे अछूत और नीच के माथे पर राजाओं जैसा छत्र रख दिया, अर्थात तुम्हीं ने मुझे राजाओं जैसा सम्मान प्रदान किया | मैं वह अभागा हूँ जिसको छूने मात्र से सारे संसार को दोष लगता है, तब भी हे स्वामी ! तुमने मुझ पर असीम कृपा की | मुझ पर द्रवित हो गए | हे गोविंद ! तुमने मुझ जैसे नीच प्राणी को इतना उच्च सम्मान प्रदान किया | सचमुच तुम्हें किसी का भी भय नहीं  है |

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै |
कहि
रविदासु सुनहु रे संतहु हरीजीउ ते सभै सरै  || 

अर्थात -

    आपकी कृपा से नामदेव जैसे  छीपी, कबीर जैसे जुलाहे, त्रिलोचन जैसे सामान्य, सधना जैसे कसाई और सैन जैसे नाई संसार से तर गए | उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया | रविदास कहते हैं- हे संतो, सुनो ! हरी जी सब कुछ करने में समर्थ है | वे कुछ भी कर सकते हैं | 

 

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ऐसी लाल तुझ बिनु कौन करे- रैदास प्रश्नोत्तर

रविवार, 9 अगस्त 2020

अग्निपथ काव्य - हरिवंशराय बच्चन

 अग्निपथ


हरिवंशराय बच्चन
कवि परिचय 

            हरिवंशराय बच्चन का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में 27 नवंबर 1907 को हुआ | ‘बच्चन’ इनका माता-पिता द्वारा प्यार से लिया जानेवाला नाम थाजिसे इन्होंने अपना उपनाम बना लिया था बच्चन कुछ समय तक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहने के बाद भारतीय विदेश सेवा में चले गए थे इस दौरान इन्होंने कई देशों का भ्रमण किया और मंच पर ओजस्वी वाणी में काव्यपाठ के लिए विख्यात हुए बच्चन की कविताएँ सहज और संवेदनशील हैं इनकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदनाराष्ट्र-चेतना और जीवन-दर्शन के ढोंगसामाजिक असमानता और कुरीतियों पर व्यंग्य किया है कविता के अलावा बच्चन ने अपनी आत्मकथा भी लिखीजो हिन्दी गद्य की बेजोड़ कृति मानी जाती है |

        बच्चन की प्रमुख कृतियाँ हैं : मधुशालानिशा-निमंत्रणएकांत-संगीतमिलन-यामिनीआरती और अंगारेटूटती चट्टानेंरूप तरंगिणी (सभी कविता-संग्रह) और आत्मकथा के चार खंड : क्या भूलूँ क्या याद करूँनीड़ का निर्माण फिरबसेरे से दूरद्वार से सोपान तक | बच्चन साहित्य अकादमी पुरस्कारसोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार और सरस्वती सम्मान से सम्मानित हुए |

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

वृक्ष हो भले खड़े, 

हों घने, हों बड़े, 

एक पत्र-छाँह भी माँग मत! माँग मत! माँग मत! 

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! 

 शब्दार्थ- 

अग्निपथ- आग से भरा रास्ता, कठियानाइयों से भरा रास्ता 

घने- बहुत ज्यादा। 

पत्र- पत्ता। 

छायाँ- छाया।

अर्थ- 

     हरिवंशराय बच्चन कहते हैं- यह जीवन अग्नि भरे रास्ते के समान है इसमें कठिनाइयाँ ही कठिनाइयाँ हैसंघर्ष ही संघर्ष हैं | हे  मनुष्य ! तुम्हारे रास्ते में भले ही वृक्ष खड़े हों वे वृक्ष घने और बड़े होंकिन्तु तुम्हें उनसे एक पत्ता भर छाँह भी नहीं माँगनी चाहिए तुम्हें कठिनाइयों भरे रास्ते पर निरंतर संघर्ष करते हुए चलते चले जाना चाहिए यह जीवन अग्नि पथ के समान है इसकी कठिनाइयों का स्वीकार करना चाहिए | 

तू न थकेगा कभी! 

तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी! - कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

शब्दार्थ-        

शपथ- सौगंध, कसम 

अर्थ- 

    कवि मनुष्य को संबोधित करके कहता है- हे मनुष्य ! तेरे सामने कठिनाइयों से भरा संसार है परंतु तू इससे घबरा मत तू शपथ ले कि तू इस मार्ग पर निरंतर चलता रहेगा तू कभी कठिनाइयों से घबरा कर रुकेगा नहींअपनी चाल को रोकेगा नहीं और पीछे मुड़कर भागेगा  नहीं तेरे चारों ओर यह कठिनाइयों से भरा संसार हैं |


यह महान दृश्य है- 

चल रहा मनुष्य है 

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! 


   शब्दार्थ –

अश्रु- आँसू

स्वेद – पसीना                            

लथपथ – सना हुआ, भरा हुआ। 

आशय -

       कवि मनुष्य को संबोधित कराते हुए कहता है- हे मनुष्य!

 यह संसार आग भरे रास्ते के समान कठिन है। इस कठिन मार्ग 

पर सबसे सुंदर दृश्य यही हो सकता है कि मनुष्य कठिनाइयों को 

झेलते हुए निरंतर चल रहा है। कठिनाइयों को झेलते-झेलते उसकी 

आँखों से आँसू बह रह है, शरीर से पसीना निकाल रहा है और तन 

से खून बह रहा है। फिरत वह इसकी परवाह किए बिना निरंतर 

संघर्ष के रास्ते पर बढ़ा जा रहा है। सामने कठिनाइयों से भरा मार्ग 

है। फिर भी मनुष्य को चलते चले जाना है। 


निम्नांकित लिंक को क्लिक करके प्रस्तुत काव्य के ज्ञान का स्व-मूल्यांकन करे- 

'अग्निपथ' काव्य के प्रश्नोत्तर

त्श्ले

षणवाली कविताएँ भी लिखी हैं | राजनैतिक जी
हरिवंशराय बच्चन का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में 27 नवंबर 1907 को हुआ | ‘बच्चन’ इनका माता-पिता द नाम था, जिसे
 इन्होंने अपना उपनाम बना लिया था | बच्चन कुछ समय तक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहने के बाद भारतीय विदेश सेवा में चले गए थे | इस दौरान इन्होंने कई

अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी - रैदास

 

रैदास के पद


जीवन परिचय

                            रैदास नाम से विख्यात संत रैदास का जन्म सन् 1318 में बनारस में हुआ, ऐसा माना जाता है | इनकी ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था| मध्ययुगीन  साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है | कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के कवियों में गिने जाते हैं | मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का जरा भी विश्वास न था| वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे |

कृतित्व

                           रैदास ने अपनी काव्य रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी , राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है | रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं | सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के सारे भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए हैं | इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं | रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहबमें भी सम्मिलित हैं |   

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी 

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी |

प्रभु जी, तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी |

प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा |

प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती |

प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा |

प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै  रैदासा ||


कठिन शब्द

रट लागी -आदत लग गई     

जाकी- जिसकी

बास- सुगंध                 

समानी- समा गई

घन बादल               

चंद- चाँद

चकोरा- तितर जाती का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है |

बाती- रुई की बत्ती       

जोति-लौ

बरै- जलती है                

सोनहिं - सोने से

सुहागा-सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में लाया जानेवाला क्षार |

दासा- सेवक

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी

अर्थात-

   हे प्रभु ! हमारे मन में जो आपके नाम की रट लग गई है, वह कैसे छूट सकती है ? अब तो मैं तुम्हारा परम भक्त हो गया हूँ |

प्रभु जी, तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी |

अर्थात

         तुममें और मुझमें वही संबंध स्थापित हो चुका है जो चंदन और पानी में होता है | जैसे चंदन के संपर्क में रहने से पानी में उसकी  सुगंध फैल जाती है, उसी प्रकार मेरे तन-मन में तुम्हारे प्रेम की सुगंध व्याप्त हो गई है | मैं पानी हूँ, तुम चन्दन हो |

प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा |

अर्थात-

          प्रभु जी ! तुम आकाश में छाए काले बादलों के समान हो, मैं जंगल में नाचने वाला मोर हूँ | जैसे वर्षा बरसाते बादलों को घुमड़ते देखकर मोर खुशी से नाचने लगते हैं, उसी भाँति मैं आपके दर्शन पाकर खुशी से भावमुग्ध हो उठता हूँ | हे प्रभु जी ! जैसे चकोर पक्षी सदा अपने प्रेम पात्र चंद्रमा की ओर ताकता रहता है उसी भाँति मैं भी सदा तुम्हारा प्रेम पाने के लिए तरसता रहता हूँ | आप चंद्रमा हो तो मैं चकोर हूँ |

प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरे दिन राती |

अर्थात-

    हे प्रभु ! तुम दीपक हो, मैं तुम्हारी बाती हूँ | मैं बाती के समान सदा तुम्हारे प्रेम में जलता रहता हूँ | तुम्हारे प्रेम की चमक दिन-रात मेरे मन में समाई रहती है|  

प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा |

अर्थात-

    प्रभु ! तुम मोती के समान उज्ज्वल, पवित्र और सुंदर हो | मैं उसमें पिरोया हुआ धागा हूँ | मेरा तन-मन तुम्हारी  कान्ति से ओतप्रोत है | तुम्हारा और मेरा मिलन सोने और सुहागे के मिलन के समान  पवित्र है | जैसे सुहागे के संपर्क में आकार सोना और अधिक खरा हो जाता है, उसी भाँति मैं तुम्हारे संपर्क में रहने से शुद्ध-बुद्ध हो जाता हूँ |

प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करे रैदासा |

अर्थात-  

     हे प्रभु जी ! तुम मेरे स्वामी हो, मैं तुम्हारा दास हूँ, सेवक हूँ | मैं रविदास, तुम्हारे चरणों में इसी प्रकार की दास्य भक्ति अर्पित करता हूँ |


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अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी - काव्य के प्रशानोत्तर




 

 

 

 

 

शनिवार, 8 अगस्त 2020

आदमीनामा- नजीर अकबरीबादा

 

आदमीनामा

          कवि नज़ीरअकबराबादी


कवि परिचय

             नज़ीर अकबराबादी का जन्म आगरा शहर में सन् 1735 में हुआ | इन्होंने आगरा के अरबी-फ़ारसी के मशहूर आदीबों से तालिम हासिल की | नज़ीर हिन्दू त्योहारों में बहुत दिलचस्पी लेते थे और उनमें शामिल होकर दिलोजान से लुत्फ़ उठाते थे | मियाँ नज़ीर राह चलते नज़्में कहने के लिए मशहूर थे | अपने टट्टू पर सवार नजीर को कहीं से आते-जाते समय राह में कोई भी रोककर फ़रियाद करता था कि उसके हुनर या पेशे से ताल्लुक रखनेवाली कोई नज़्म कह दीजिए | नज़ीर आनन-फानन में एक नज़्म रच देते थे | यही वजह है कि भिश्ती, ककड़ी बेचनेवाला, बिसाती तक नजीर की रची नज़्में गा-गाकर अपना सौदा बेचते थे, तो वहीं गीत गाकर गुजर करनेवालियों के कंठ से भी नजीर की नज़्में ही फूटती थी |

कृतित्व          

             नज़ीर दुनिया के रंग में रँगे हुए एक महाकवि थे | इनकी कविताओं में दुनिया हँसती-बोलती, जीती-जागती, चलती-फिरती और जीवन का त्योहार मनाती नज़र आती है | नज़ीर ऐसे कवि हैं, जिन्हें हिन्दी और  उर्दू, दोनों भाषाओं के आम जन ने अपनाया| नज़ीर की कविताएँ हमारी राष्ट्रीय एकता की मिसाल हैं, जिनमें कई जातियाँ, कई प्रदेश, कई भाषाएँ और कई परंपराएँ होते हुए भी सबमें एका है|

              नज़ीर अपनी रचनाओं में मनोविनोद करते हैं| ज्ञानी की तरह नहीं, मित्र की तरह सलाह-मशविरा देते हैं, जीवन की समालोचना करते हैं| ‘सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजाराजैसी नसीहत देनेवाला यह कवि अपनी रचनाओं में जीवन का उल्लास और जीवन की सच्चाई उजागर करता है|



कठिन शब्दार्थ


मुफ़लिस- गरीब, दीन-दरिद्र          

गदा- भिखारी

ज़रदार - धनवान, दौलतमंद         

बेनवा- कमजोर

निअमत- स्वादिष्ट भोजन        

इमाम - नमाज पढ़ानेवाले धार्मिक मुसलमान

खुतबाख्वाँ- कुरान शरीफ का अर्थ बताने वाला   

ताड़ता- भाँप लेना          

वारे- न्योछावर करता,  अर्पित कर देता,            

तेग- तलवार

अशराफ़- शरीफ लोग               

कमीना- तुच्छ, हेय, नीच

शाह- राजा, सम्राट                 

वज़ीर- मंत्री

कारे- कार्य                       

दिलपजीर- मनवाँछित, मनचाहा

मुरीद-शिष्य                      

पीर- धार्मिक गुरु



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दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी
ज़रदार  बेनवा  है  सो वो  भी  आदमी
निअमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है  वो  भी  आदमी 

मसजिद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्वाँ
पढ़ते हैं आदमी ही कुरआन और नमाज़ यां
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ
जो उनको ताड़ता है सो वो भी आदमी

यां आदमी पै जान को वारे है आदमी
और आदमी पै तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुनके दौड़ता है सो है वो भी आदमी

अशराफ़ और कमीने से ले शाह ता वज़ीर
ये आदमी ही कराते हैं सब कारे दिलपजीर
यां आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ए नज़ीर  
और सबमें जो बुरा है सो वो भी आदमी



 


दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी
ज़रदार  बेनवा  है  सो वो  भी  आदमी
निअमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी
टूकड़े चबा रहा है सो है  वो  भी  आदमी 


आशय :-

     कविता में नजीर अकबराबादी आदमी के भिन्न-भिन्न रंग-रूपों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं- इस दुनिया में तरह-तरह के आदमी हैं |  जो लोगों का बादशाह बना बैठा है, वह भी आदमी है | उसके पास दुनिया भर की दौलत और अधिकार हैं | दूसरी ओर, जो बिल्कुल गरीब, दीन-हीन, भिखारी और फकीर हैं, वे भी आदमी हैं | जिसके पास बहुत दौलत है, वह भी आदमी है | जो बिल्कुल कमज़ोर है, वह भी आदमी है | जो स्वादिष्ट भोजन खा रहा है, वह भी आदमी है और जिसे सूखी रोटी के टुकड़े चबाने को मिल रहे हैं, वह भी आदमी है| आशय यह है कि आदमी के अनेक रंग-रूप है ।



मसजिद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्वाँ
पढ़ते हैं आदमी ही कुरआन और नमाज़ यां
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ
जो उनको ताड़ता है सो वो भी आदमी


आशय-

       नज़ीर अकबराबादी मनुष्य के तरह-तरह के रंग-रूप और स्वभाव का चित्रण करते हुए कहते हैं- सुन मेरे भाई ! इस दुनिया में आकर जिसने मस्जिद बनाई है, वह भी आदमी है | जो मस्जिद में बैठकर नमाज पढ़ता है और जो कुरान शरीफ का अर्थ समझाता है, वह भी आदमी है | जो सामान्य मुसलमान उन इमामों से कुरान का अर्थ सुनते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं, वे भी आदमी हैं | इन सबके विपरीत जो दुष्ट मस्जिद में आकर इमामों, नमाजियों कि जूतियाँ चुराकर ले जाते हैं, वे भी आदमी हैं | जो लोग ऐसे चोरों पर नजर रखते हैं, वे भी आदमी हैं | आशय यह है कि यद्यपि संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के परस्पर-विरोधी काम करने वाले लोग हैं, परंतु वे सब आदमी के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं | मनुष्य में कुछ भी बनने की संभावनाएँ हैं |



यां आदमी पै जान को वारे है आदमी
और आदमी पै तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुनके दौड़ता है सो है वो भी आदमी

आशय-

   नज़ीर अकबरबादी कहते हैं- यों तो आदमी दूसरे आदमी पर अपनी जान भी न्योछावर कर देता है | कभी-कभी वह दूसरे आदमी का संहार करने के लिए तलवार का वार भी करता है| हैरानी की बात देखिए, समय पड़ने पर दूसरे आदमी की इज्जत को रौंदने वाला भी आदमी ही है और आवश्यकता पड़ने पर अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे को चिल्ला कर पुकारने वाला भी आदमी है | जो आदमी सुरक्षा की पुकार को सुनकर उसे बचाने के लिए दौड़ता है, वह भी आदमी है | आशय यह है कि आदमी के भिन्न-भिन्न रंग-रूप हैं | उसकी बदलती हुई परिस्थितियाँ उसे भिन्न भूमिका मेन ला खड़ा करती हैं|


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आदमीनामा - प्रश्नोत्तर



प्रस्तुतकर्ता

वघेरा शैलेषकुमार एन॰

टी॰जी॰टी॰ हिन्दी,

जवाहर नवोदय विद्यालय ,

पोरबंदर |

 

 

 

 

 

 

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