गीत-अगीत
रामधारी सिंह 'दिनकर' |
रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में 30 सितंबर 1908 को हुआ | वे सन् 1952 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए | भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से भी अलंकृत किया| दिनकर जी को ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार
मिला | अपनी काव्यकृति ‘उर्वशी’ के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया|
दिनकर की प्रमुख कृतियाँ हैं- हुंकार, कुरुक्षेत्र, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी और संस्कृति के चार अध्याय |
दिनकर जी की भाषा अत्यंत प्रवाहपूर्ण, ओजस्वी और सरल है | दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता है अपने देश और युग के सत्य के प्रति सजगता | दिनकर में विचार और संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है | इनकी कुछ कृतियों में प्रेम और सौंदर्य का भी चित्रण है |
गीत,
अगीत, कौन सुंदर है?
गाकर गीत विरह के तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कह जाती है |
तट पर एक गुलाब सोचता,
“देते स्वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर
के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता |”
गा-गाकर बह
रही निर्झरी,
पाटल मूक खड़ा तट पर है |
गीत,
अगीत कौन सुंदर है
?
शब्दार्थ
आशय
कवि पाठक से प्रश्न करता है- हे पाठकों ! तुम्हीं बताओ | गीत और अगीत में से तुम किसे सुंदर मानते हो| नदी को देखो | वह वेगवती है | वह विरह के गीत गाती हुई निरंतर बहती चली जाती है | वह अपने दुख का भार हलका करने के लिए अपने किनारों को कलकल स्वर में कुछ-कुछ कहती चली जाती है | उधर किनारे पर खड़ा हुआ गुलाब का फूल सोचता है- यदि भगवान ने मुझे भी स्वर दिया होता तो मैं सारे संसार को पतझड़ के दुख-भरे दिनों की पीड़ा अवश्य सुनाता | परंतु अफसोस ! मेरी पीड़ा मन ही में रह जाती है|
इस प्रकार नदी गा-गाकर बहती चली जा रही है और गुलाब का फूल नदी के किनारे मौन भाव से खड़ा है | दोनों सुंदर हैं | परंतु बताओ, दोनों में कौन अधिक सुंदर है ?
बैठा
शुक उस घनी डाल पर
जो
खोंते
पर छाया देती |
पंख फुला नीचे खोंते में
शूकी बैठ अंडे है सेती |
गाता
शुक
जब किरण वसंती
छूती
अंग
पर्ण से छनकर |
किन्तु, शूकी के गीत उमड़कर
रह
जाते
सनेह में सनकर |
गूँज रहा शुक का स्वर वन में,
फुला
मग्न
शूकी का पर है |
गीत, अगीत, कौन सुंदर है ?
शब्दार्थ
आशय
कवि कहता है- शुक वृक्ष की उस घनी डाली पर बैठा है जिसकी छाया उसके घोंसले पर पड रही है | उसी घोंसले में शूकी भी बैठी है | वह अपने पंख फुलाकर अपने अंडों को से रही है | जब सूरज की वसंती किरण पत्तों से छनकर आती है और उसके अंगों को छूती है तो वह प्रसन्न होकर गा उठता है | उधर शूकी भी गाना चाहती है | किन्तु उसके मन में उठने वाले गीत प्रेम और वात्सल्य में ही डूबकर रह जाते हैं | वह अपने बच्चों के स्नेह में डूबी-डूबी उन गीतों को अंदर-ही-अंदर अनुभव करती है |
देखो, शुक का स्वर वन में चारों ओर गूँज रहा है, किन्तु शूकी अपने पंखों को अंडों पर फुलाए हुए मग्न है | दोनों ही सुंदर है | शुक का स्नेह मुखर है और शूकी का मौन | एक का स्वर ‘गीत’ कहलाता है | दूसरे का मौन ‘अगीत’ कहलाता है | बताइए, इन दोनों में कौन-सा सुंदर है |
दो
प्रेमी है यहाँ, एक जब
बड़े
साँझ
आल्हा गाता है,
पहला
स्वर
उसकी राधा को
घर
से
यहाँ खींच लाता है |
चोरी-चोरी खड़ी नीम की
छाया
में
छिपकर सुनती है,
‘हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की
बिधना’, यों मन में गुनती है |
वह गाता, पर किसी वेग से
फूल
रहा
इसका अंतर है |
गीत, अगीत, कौन सुंदर है ?
शब्दार्थ
अंतर – हृदय, दिल
आशय




