शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

समास और समास के प्रकार


          * समास *


       समास शब्द का संधि विच्छेद होता है - सम्+आस = समास । सम् का अर्थ है समान रूप से और  आस का अर्थ पास रखना | दो शब्दों को जोड़ने या पास में रखने की प्रक्रिया को समास कहते है |

      समास का अर्थ है पास रखना, छोटा करना | भाषा के प्रयोग में सामासिक शब्दों के प्रयोग से संक्षिप्तता और शैली में उत्कृष्टता एवं सटीकता आती है | उदाहरण के लिए, ‘राजा का महलकहने के स्थान पर राजमहलकहना अधिक उपयुक्त  है | 


व्याख्या-

        परस्पर संबंध रखने वाले दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से बने नए शब्द बनाने क्रिया को समासकहते  है |

 

उदाहरण

रात और दिन = रात-दिन


दस हैं आनन(मुख) जिसके = दशानन



समास-विग्रह

    जब समस्त पदों को वापस पृथक्-पृथक् (अलग-अलग) किया जाता है तो उसे समास-विग्रह कहते हैं |

उदाहरण –

रात-दिन = रात और दिन

दशानन = दस हैं आनन(मुख) जिसके


समास में पद

समास रचना में प्रायः दो पद होते हैं | पहले पद को पूर्व पदऔर दूसरे पद को उत्तर पदकहते हैं और समास से बने पद को समस्त पदकहते हैं |


उदाहरण –


रात और दिन = रात-दिन

रात- पूर्व पद है |

दिन- उत्तर पद है

 

दस हैं आनन(मुख) जिसके = दशानन

दस- पूर्व पद है |

आनन – उत्तर पद है |


द्वंद्व समास


    जहाँ समस्त पद के दोनों खंड समान स्तर के हों तथा जिसमें और’, ‘या’, ‘अथवायोजक का लोप हो, वहाँ द्वंद्व समास होता है |


उदाहरण –


रात-दिन = रात और दिन

भाई-बहन = भाई और बहन




तीन-चार = तीन या चार

धर्माधर्म = धर्म और अधर्म

राजा-रानी = राजा और रानी

सुबह-शाम = सुबह और शाम

सुख-दुख = सुख अथवा दुख

दो-चार = दो और चार

 


बहुव्रीहि समास

          जहाँ पहला पद और दूसरा पद मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि  समास होता है|

        जहाँ समस्त पद अपने अर्थ से अतिरिक्त किसी अन्य अर्थ का द्योतन करता हो,   वहाँ बहुव्रीहि  समास होता है|

 

उदाहरण -

  दशानन – दस हैं आनन जिसके (रावण)

  चन्द्रशेखर – चंद्र है शिखर पर जिसके (शंकर)

त्रिवेणी- तीन नदियों का संगम स्थल (प्रयागराज)

  पीतांबर – पीले हैं वस्त्र जिसके (कृष्ण)

  दूधमुँहा- मुँह में दूध है जिसके (छोटा बच्चा)

  त्रिनेत्र – तीन हैं नेत्र जिसके (शिव)


  महात्मा – महान आत्मा हैं जिसकी

  मुरलीधर- मुरली धारण करने वाला (कृष्ण)



कर्मधारय समास 


      जिस समास में एक पद विशेषण तथा दूसरा विशेष्य हो अथवा एक पद उपमान और दूसरा पद उपमेय हो , वहाँ पर कर्मधारय समास होता है |


उदाहरण –


   नीलकमल- नीला कमल


   महाराजा – महान राजा

   चंद्रमुख चन्द्र के समान मुख

   पीतांबर – पीला है जो अंबर

   नृसिंह – नरों में सिंह के समान

   महात्मा – महान है जो आत्मा

   श्वेतांबर – श्वेत है जो वस्त्र

   प्रधानाध्यापक प्रधान है जो अध्यापक

   गोबरगणेश गोबर से बना गणेश

 

द्विगु समास


       जहाँ समस्त पद में प्रथम पद संख्यावाचक विशेषण हो, वहाँ द्विगु समासहोता है |


उदाहरण –

     त्रिभुवन – तीन भुवनों का समूह

     अष्टाध्यायी – आठ अध्यायों का समूह

     चौपाई – चार पंक्तियों का समाहार

     सप्ताह – सात दिनों का समाहार

     चौमासा – चार मासों का समूह

     नवग्रह नव ग्रहों का समाहार

     तिरंगा – तीन रंगों का समाहार

     चौराहा – चार राहों का समाहार



     दोपहर – दो पहरों का समाहार

 


अव्ययीभाव समास


जिस समास में पहला पद अव्यय हो, उसे अव्ययीभाव समासकहते हैं |


उदाहरण


 आजन्म – जन्म से लेकर

 आजीवन – जीवन-पर्यंत / जीवन भर

 आमरण – मरण तक

 निडर – ड़र रहित




 प्रतिदिन – दिन-दिन

 घर-घर प्रत्येक घर

 भरपेट – पेट भर कर

 यथाशक्ति शक्ति के अनुसार

 प्रतिक्षण – प्रत्येक क्षण 

 


तत्पुरुष समास


      जिस समास में उत्तर पद प्रधान होता है और प्रथम पद गौण होता है तथा विग्रह करते समय बीच में परसर्ग(ने, का, के लिए,में, पर आदि) जोड़े जाते हैं, वहाँ पर तत्पुरुष समास बनता हैं |


उदाहरण –

      पदप्राप्त पद को प्राप्त

      अकालपीड़ित अकाल से पीड़ित

      ग्रामगत ग्राम को गया हुआ

      वाग्दत्ता – वाणी द्वारा दत्त

      गौशाला – गौ के लिए शाला



      विद्यालय – विद्या के लिए आलय

      अमृतधारा – अमृत की धारा

      आनंदमग्न आनंद में मग्न

      अनादर – न आदर

 

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समास और उसके प्रकार प्रश्नोत्तर

 

 

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समास और उसके प्रकार

 

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

खुशबू रचते हैं हाथ- अरुण कमल

 

खुशबू रचते हैं हाथ

       - अरुण कमल

 


कई गलियों के बीच

कई नालों के पार

कूड़े-करकट

के ढेरों के बाद

बदबू से फटते जाते इस

टोले के अंदर

खुशबू रचते हैं हाथ |

 

शब्दार्थ –

नाला घरों और सडाकों के किनारे गंदे पानी के बहाव के लिए बनाया रास्ता

कूड़ा-करकट कचरा, रद्दी, गंदगी

टोला छोटी बस्ती

 

आशय -

               कवि कहता है- जो हाथ खुशबू फैलाने वाली अगरबत्तियों का निर्माण करते हैं वे स्वयं कैसी बदबूदार बस्तियों में रहते हैं | उन्हें कई गलियों के बीच, अनेक नालों को पार करने बाद कूटे-करकट और गंदगी के ढेरों के आसपास वहाँ रहना पड़ता है, जहाँ उनकी नाक बदबू के मारे फटने को हो जाती   है |


उभरी नसोंवाले हाथ
घिसे नाखूनोंवाले हाथ
पीपल के पत्ते-से नए-नए हाथ
जूही की डाल-से खुशबूदार हाथ
गंदे कटे-पिटे हाथ
ज़ख्म से फटे हुए हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
|

 

शब्दार्थ –

जूही- एक फूल

ज़ख्म- घाव

 

आशय -

                       कवि कहता है- जो मजदूर खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं और सारे संसार को खुशबू से महका देते हैं, वे तरह-तरह के हैं | उनमें वे बूढ़े-बुढ़ियाँ भी हैं जिनके हाथों की नसें उभर चुकी हैं या जिनके हाथों के नाखून काम करते-करते घिस चुके हैं | अगरबत्तियाँ बनाने वालों में वे नन्हें बालक-बालिकाएँ भी हैं जिनके हाथ पीपल के पत्तों के समान कोमल हैं | उनमें वे नवयुवतियाँ भी हैं जिनके हाथ जूही के फूल की डाली  के समान खुशबूदार हैं | इनमें काम की अधिकता के कारण गंदे हाथों वाले और कटे हाथों वाले मज़दूर भी हैं और अपने मालिक, पति या पिता की मार खाए हुए हाथ भी हैं | कुछ मज़दूर ऐसे हैं जिनके हाथों में घाव हो चुका हैं |’ फिर भी वे काम किए जा रहे हैं | इतनी विपत्तियों के बावजूद ये काम करते चले जा रहे हैं | 

 

यहीं इस गली में बनती हैं
मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ
इन्हीं गंदे मुहल्लों के गंदे लोग
बनाते हैं केवड़ा गुलाब खस और रातरानी अगरबत्तियाँ
दुनिया की सारी गंदगी के बीच
दुनिया की सारी खुशबू
रचते रहते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ
|


शब्दार्थ-


मुल्क- देश


केवड़ा- एक छोटा वृक्ष जिसके फूल सुगंधित होते हैं 


खस- पोस्त 


रातरानी- रात में सुगंध देने वाला एक फूल


आशय –

    कवि कहता है- देखो, कैसा व्यंग्य है ! देश की प्रसिद्ध अगरबत्तियाँ इस गंदी तंग बदबूदार गली में बनती हैं | इन्हीं गंदे मुहल्लों में रहने वाले गंदे लोग केवड़ा, गुलाब, पोस्ता और रातरानी की सुगंध वाली महमहाती अगरबत्तियाँ बनाते हैं | यद्यपि वे दुनिया भर की गंदगी के बीचोंबीच रहते हैं और जीते हैं किन्तु अपने हाथों से दुनिया को महमह करने वाली खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं | इस प्रकार वे स्वयं गंदे रहकर भी खुशबू बाँटते हैं | जी, हाँ ये ही श्रमिक खुशबू पैदा करते हैं, खुशबूदार अगरबत्तियाँ बनाते हैं और सुगंध बिखेरते हैं |

 

 

बुधवार, 12 अगस्त 2020

नए इलाके में -अरुण कमल

 नए इलाके में -

  अरुण कमल


कवि परिचय

     अरुण कमल का जन्म बिहार के रोहतास जिले के नासरीगंज में 15 फरवरी 1954 को हुआ | ये इन दिनों पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं | इन्हें अपनी कविताओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया | इन्होंने कविता-लेखन के अलावा कई पुस्तकों और रचनाओं का अनुवाद भी किया है |

                    

      अरुण कमाल की प्रमुख कृतियाँ हैं : अपनी केवल धार, सबूत, नए इलाके में, पुतली में संसार (चारों कविता-संग्रह) तथा कविता और समय (आलोचनात्मक कृति) इनके अलावा अरुण कमल ने मायकोव्यस्की की आत्मकथा और जंगल बुक का हिन्दी में और हिन्दी के युवा कवियों की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जो वॉयसेज’ नाम से प्रकाशित हुआ |


    इन नए बसते इलाकों में

जहाँ रोज़ बन रहे हैं नए-नए मकान

मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ

धोखा दे जाते हैं पुराने निशान

खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़

खोजता हूँ ढहा हुआ घर

और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ

मुड़ना था मुझे

फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का

घर था इकमंजिला

और मैं हर बार एक घर पीछे

चल देता हूँ

या दो घर आगे ठकमकाता


शब्दार्थ-


इलाका- क्षेत्र,
अकसर- प्रायः ,
ताकता- देखता हुआ,
ढहा हुआ- गिरा हुआ
ठकमकाता- डगमगाता हुआ 

आशय –


      कवि किसी नई बस्ती में पहुँचता है तो प्रायः रास्ता भूल जाता है हैं, कारण यह है कि वहाँ रोज़ नए-नए मकान बन रहे हैं | इसलिए उसने आने-जाने के रास्तों और ठिकानों तक पहुँचने के लिए जो निशान बनाए होते थे, वे अब काम नहीं आते | वह पीपल का पुराना पेड़ खोजता है या कोई टूटा हुआ घर ढूँढता है या जमीन का कोई खाली टुकड़ा ढूँढता है, जहाँ से उसे बाएँ हाथ की तरफ मुड़ना था | परंतु बहुत समय बाद न तो पीपल का पेड़ रहा | उसे लोगों ने उखाड़ दिया | न गिरा हुआ घर रहा | वहाँ किसी ने नया मकान बना लिया | न जमीन का खाली टुकड़ा रहा, क्योंकि वहाँ भी किसी ने मकान बना लिया | अतः उसकी सारी पुरानी निशानियाँ गायब हो गई | उसे याद था कि खाली प्लाट के दो मकान के बाद एकमंज़िला मकान था जिसके बाहर बिना रंग वाला लोहे का फाटक लगा था | परंतु अब वह एकमंजिला मकान दुमंजिला हो गया और उसका फाटक सज-धज गया | इसलिए वह अकसर ठिकाना भूलकर या तो अपने घर से एकाध घर पहले ही मुड़ जाता है या घर से दो घर आगे पहुँच जाता है |


यहाँ रोज़ कुछ बन रहा है

  रोज़ कुछ घट रहा है

  यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं

  एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया

  जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ

  जैसे बैसाख का गया भादों को लौटा हूँ

  अब यही है उपाय कि हर दरवाज़ा खटखटओ

  और पूछो-क्या यही है वो घर ?

  समय बहुत कम है तुम्हारे पास

  आ चला पानी ढहा आ रहा अकास

  शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर |


शब्दार्थ-


     घट- घटित होना, होना

     स्मृति- याद

     वसंत- एक मनमोहक ऋतु

     पतझड़- एक ऋतु जिसमें पेड़ के पत्ते झड़ जाते हैं

     बैसाख- चैत्र के बाद वाला महीना

     भादों- सावन के बाद आने वाला महीना

     अकास- आकाश 

             

आशय –

       कवि कहता है- नए इलाके की नई बस्ती में रोज़ ही कुछ नया बन जाता है | और कुछ नए मकान बन जाते हैं | नई घटनाएँ घट जाती हैं | इसलिए यहाँ पुरानी जगह ढूँढने के लिए अपनी याददाश्त पर भरोसा नहीं किया जा सकता | पुरानी यादें, पुरानी निशानियाँ बेमानी हो जाती हैं | बदली हुई स्थितियों में वे काम ही नहीं आतीं | एक ही दिन में इतना नया निर्माण हो जाता है कि कल बनी जगहें पुरानी पड़ जाती हैं | पुरानी यादों के सहारे जब नए इलाके में जाता हूँ तो ऐसा आश्चर्य होता है मानो मैं वसंत के मौसम में वहाँ गया था और लौटा हूँ तो पतझड़ हो गई है | मानो बैसाख के महीने में बस्ती में गया था और लौटते-लौटते भादों आ गई है | आशय यह है कि नई बस्ती में बड़ी तेजी से बदलाव आ रहा है |

     

       अब तो इन बस्तियों में अपना ठिकाना तलाशने का यही एक उपाय है कि लोगों के घर-घर जाया जाए और उनसे पूछा जाए कि क्या यह वही घर है जिसे मैं ढूँढ रहा हूँ | परंतु तुम्हारे पास बहुत कम समय है | तुम पूछते हुए भी यों घबरा रहे हो मानो बाढ़ आने वाली हो या आकाश ढहा जा रहा हो | तुम्हें इस बात का इंतजार है कि शायद तुम्हारा कोई जाना-पहचाना आदमी तुम्हें पहचान ले और तुम्हारा नाम पुकार कर बुला ले |


मंगलवार, 11 अगस्त 2020

रहीम के दोहे - रहीम

 रहीम के दोहे - रहीम 



कवि परिचय 

    रहीम का जन्म लाहौर (अब पाकिस्तान) में सन् 1556 में हुआ | इनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था| रहीम अरबी, फारसी, संस्कृत और हिन्दी के अच्छे जानकार थे| इनकी नीतिपरक उक्तियों पर संस्कृत कवियों की स्पष्ट छाप परिलक्षित होती है | मध्ययुगीन दरबारी संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं | रहीम, अकबर के दरबार में हिन्दी कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान था| रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे|

                रहीम के काव्य का मुख्य विषय शृंगार, नीति और भक्ति है | रहीम बहुत लोकप्रिय कवि थे | इनके दोहे सर्वसाधारण को आसानी से याद हो जाते है| इनके नीतिपरक दोहे ज्यादा प्रचलित है, जिनमें दैनिक जीवन के दृष्टांत देकर कवि ने उन्हें सहज, सरल और बोधगम्य बना दिया है| रहीम को अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था| इन्होंने अपने काव्य में प्रभावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है|

         रहीम की प्रमुख कृतियाँ हैं : रहीम सतसई, शृंगार, सतसई, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, बरवै, रहीम रत्नावली, भाषिक भेदवर्णन | ये सभी कृतियाँ ‘रहीम ग्रंथावली’ में समाहित है | 

     * दोहे *


 रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय |

   टूटे से फिर ना मिले, मिले तो गाँठ परि जाय ||


   रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय |

   सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय ||


   एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय |

   रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय ||


   चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस |

   जा पर बिपदा पड़त हैं, सो आवत यह देस ||


   दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं |

   ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं ||


   धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय |

   उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय ||


   नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत |

   ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत ||


   बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय |

   रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय ||


   रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिये डारि |

   जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि ||


   रहीमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय |

   बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय ||


   रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून |

   पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून ||


रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय |
टूटे से फिर ना मिले, मिले तो गाँठ परी जाय ||


कठिन शब्दार्थ- 

           चटकाय= चटका कर

              परि जाय= पड़ जाती है |

व्याख्या-

     रहीम कहते हैं- प्रेम धागे के समान अखंड और कोमल होता है | इसे कभी भी जान बूझकर तोड़ना नहीं चाहिए | यदि एक बार धागा टूट गया तो फिर जुड़ नहीं पाता | यदि जोड़ भी दिया जाए तो उसमें गाँठ पड़ जाती है | आशय यह है कि प्रेम एक बार टूट जाए तो मन में ग्रंथि रह जाती है |


रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय |   सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय ||


कठिन शब्दार्थ- 

निज= अपना ,        बिथा= दुख,व्यथा

गोय= छिपाकर,               अठिलैहैं= प्रसन्न होंगे

 लैहैं= लेंगे,                        कोय= कोई भी 


व्याख्या-

              रहीम लोगों को उपदेश देते हुए कहते हैं- लोगों ! तुम अपने मन की वेदना को अपने मन में ही छिपाकर रखो | उसे किसी के सामने प्रकट मत करो| यह संसार बहुत निर्दय है | लोग तुम्हारे कष्ट को सुनकर प्रसन्न ही होंगे | कोई भी मनुष्य तुम्हारे दुख को कम करने के लिए प्रयत्न नहीं करेगा | 

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय |
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय || 

कठिन शब्दार्थ- 

      साधे= साधने पर,                    सधै= सध जाते हैं

      जाय= चले जाते  हैं, नष्ट हो जाते हैं

      मूलहिं=मूल को, जड़ को,         सींचिबो= सींचने से

      फूलै= फूलों से,       फलै= फलों से,       अघाय= तृप्त
 
व्याख्या-

       रहीम कहते हैं कि एक परमात्मा को पा लेने से अन्य सब सांसारिक उपलब्धियाँ स्वयमेव प्राप्त हो जाती है | परंतु यदि परमात्मा की भक्ति न की और अन्य सांसारिक वस्तुओं को पा लिया तो वे सब उपलब्धियाँ परमात्मा के अभाव में कुछ काम नहीं आतीं या नष्ट हो जाती हैं| इसलिए रहीम जी कहते हैं कि हे मनुष्य! तुम जड़ को सींचो | उसी से तुम फल-फूल पाकर तृप्त हो सकोगे| आशय यह है कि जो व्यक्ति इस सृष्टि के मूल परमात्मा को ध्याता है, वह सब प्रकार के सांसारिक फलों को पाकर तृप्त हो जाता है | 

चित्रकूट में रमि रहे,  रहिमन अवध-नरेस |
जा पर बिपदा पडत हैं,   सो आवत यह देस ||

कठिन शब्दार्थ- 

रमि रहे= लीन हो गए, रम गए

अवध नरेश= अयोध्या के राजा राम

 जा पर= जिस पर,                           बिपदा=संकट      सो=वह

  आवत= आता है,                            देस= प्रदेश, क्षेत्र 


व्याख्या-

        रहीम कहते हैं- यह चित्रकूट अत्यंत मनोरम तथा धार्मिक प्रदेश है | जिस पर भी विपत्ति आती है, वही शांति पाने के लिए इस प्रदेश में खिंचा  चला आता है| देखिए, अयोध्या के राजा राम पर विपत्ति पड़ी, उन्हें राजपाट छोड़कर वनों में जाना पड़ा तो वे चित्रकूट में चले आए |    अब वे पूरी तरह इस प्रदेश में रम गए हैं | उनका  मन यहाँ रम गया है | 


दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं |
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं ||


कठिन शब्दार्थ- 

दीरघ= लंबा,      अरथ= अर्थ            आखर= अक्षर

थोरे= थोड़े,              आहिं= होते है                      नट= कलाकार

कुंडली= घेरा, गोल आकार का लोहे का चक्का जो अंदर से खाली होता है    

सीमिटि= सिकुड़कर               चढ़ि= निकल 


व्याख्या-

       रहीम कहते हैं- दोहा छंद ऐसा है जिसमें अक्षर तो थोड़े होते हैं किन्तु उनमें बहुत गहरा और दीर्घ अर्थ छिपा रहता है| जिस प्रकार कोई कुशल बाजीगर अपने शरीर को सिकोड़कर तंग मुँह वाली कुंडली के बीच में से कुशलतापूर्वक निकल जाता है उसी प्रकार कुशल दोहाकार दोहे के सीमित-से शब्दों में बहुत बड़ी और गहरी बात कह जाता है|


धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय |
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय ||


कठिन शब्दार्थ- 

धनि= धन्य                 पंक= कीचड़,       

लघु जिय=छोटे जीव          पिअत= पीकर,     

अघाय= प्यास बुझाकर        उदधि= समुद्र,  

बड़ाई= महानता,             जगत= संसार            पिआसो= प्यासा


व्याख्या-
         रहीम कहते हैं- मेरी दृष्टि में कीचड़ का जल भी धन्य है क्योंकि उससे कितने ही लघु जीव अपनी प्यास बुझाते हैं| समुद्र की महानता किस काम की, जिसका जल पीने योग्य नहीं है | संसार के लोग उसके किनारे आकर भी प्यासे के प्यासे रह जाते हैं | आशय यह है कि महान वही है जो किसी के काम आए |

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत |
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत ||

कठिन शब्दार्थ- 

नाद=संगीत,धुन             रीझि=प्रसन्न होकर         

तन= शरीर                 मृग=हिरण        

हेत= कल्याण-कामना         समेत= सहित


व्याख्या-

       रहीम कहते हैं- संगीत की मोहिनी तान पर झूमते हुए हिरण अपने प्राण तक न्योछावर कर देता है| इसी प्रकार किसी की कला पर मुग्ध होकर मनुष्य उस पर प्रेम सहित धन अर्पित कर देता है| परंतु वे मनुष्य तो पशु से भी अधिक जड़ हैं जो किसी पर रीझकर भी उसे कुछ नहीं देते |


बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय |
रहिमन फाटे दूध को,
मथे
न माखन होय ||


कठिन शब्दार्थ- 

बिगरी बात= बिगड़ी हुई बात ,      

करौ किन कोय= कोई कुछ भी क्यों न करै

फाटे= फटे हुए                     मथे= मथने पर 


व्याख्या-

           रहीम कहते है- एक बार जो बात बिगड़ जाती है, वह लाख प्रयत्न करने पर भी सँवरती नहीं है| उदाहरण है- यदि एक बार दूध फट जाए तो उसे कितना भी मथो, लेकिन उसमें से मक्खन नहीं निकलता| 


रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिये डारि |
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि ||


कठिन शब्दार्थ-

बड़ेन= बड़ों,                लघु= छोटा 

डारि= डाल, फेंक, त्याग              कहा करे= क्या करेगी

तरवारि= तलवार 
व्याख्या-

         रहीम कहते हैं- हमें बड़े लोगों के सामने देखकर छोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए | छोटों का भी अपना महत्व होता है | उदाहरण के रूप में, जहाँ सुई का प्रयोग होता है, वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती | अतः छोटों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए |


रहीमन निज संपति बिना, कोन बिपति सहाय |बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय||


कठिन शब्दार्थ- 

निज= अपनी         बिपति= संकट     

सहाय= सहायक              जलज= कमल   

 रवि= सूर्य 


व्याख्या-

         रहीम कहते हैं कि संकट की स्थिति में मनुष्य की निजी धन-दौलत  ही उसकी सहायता करती है | जिस प्रकार पानी का अभाव होने पर सूर्य कमल की कितनी ही रक्षा करने की कोशिश करे, किन्तु उसे बचाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार मनुष्य को बाहरी सहायता कितनी ही क्यों न मिले, किन्तु उसकी वास्तविक रक्षक तो निजी संपत्ति होती है |


रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून |
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून
 
||

कठिन शब्दार्थ- 

पानी= चमक, सम्मान, जल

सून= व्यर्थ, शून्य                              ऊबरै= उभरे, चमके

मानुष= मनुष्य                                  चून= आटा


व्याख्या-

      रहीम कहते हैं- पानी का बहुत महत्त्व  हैं | इसे बनाए रखो | यदि समाप्त हो गया तो न तो मोती का कोई महत्त्व रह जाता है, न मनुष्य का और न आटे का | पानी अर्थात् चमक के बिना मोती बेकार है, पानी अर्थात्  सम्मान के बिना मनुष्य-जीवन व्यर्थ है और जल के बिना रोटी नहीं बन सकती, इसलिए आटा बेकार है |


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एक फूल की चाह- सियारामशरण गुप्त

  एक फूल की चाह- सियारामशरण गुप्त कवि परिचय             सियारामशरण गुप्त का जन्म झाँसी के निकट चिरगाँव में सन् 1895 में हुआ था | राष्ट्र...